देशभर की निचली अदालतों में आरक्षित श्रेणी के जजों की संख्या को लेकर अहम आंकड़े सामने आए हैं, जो कुल संख्या का लगभग आधा हिस्सा है। गुरुवार को राज्यसभा में केंद्र सरकार ने लोअर जुडिशरी में आरक्षित वर्ग के जजों को लेकर राज्यवार विवरण पेश किया।
नई दिल्ली: देश की न्यायिक व्यवस्था में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। अब केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में पेश किए गए ताजा आंकड़ों ने निचली अदालतों (लोअर जुडिशरी) में OBC, SC और ST वर्गों के जजों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, देशभर की जिला और अधीनस्थ अदालतों में कार्यरत जजों में से करीब 46 प्रतिशत आरक्षित श्रेणियों से आते हैं।
कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने उच्च सदन को बताया कि इस समय भारत में निचली अदालतों में कुल 20,833 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं, जिनमें लगभग आधे जज सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह स्थिति राज्यों के अनुसार काफी भिन्न है।
तमिलनाडु में सबसे अधिक आरक्षित श्रेणी के जज
आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु इस सूची में सबसे आगे है। राज्य की निचली अदालतों में कुल 1,234 जज कार्यरत हैं, जिनमें से 1,205 जज (97.6%) OBC, SC या ST वर्ग से आते हैं। यानी लगभग हर 100 में से 98 जज आरक्षित श्रेणी के हैं। यह देश में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। तमिलनाडु के पड़ोसी केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है, जहां 88.5 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी आरक्षित श्रेणी से संबंधित हैं। इसके अलावा मेघालय (95%), कर्नाटक (88%) और तेलंगाना (69%) जैसे राज्यों में भी इन वर्गों की मजबूत भागीदारी देखने को मिलती है।
हिंदी भाषी राज्यों और महानगरों में अंतर
हिंदी भाषी और उत्तर भारत के कई राज्यों में तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है।
उत्तर प्रदेश में आरक्षित वर्ग के जजों की हिस्सेदारी 54% है
- मध्य प्रदेश में 49%
- राजस्थान में 45%
- पंजाब में 40%
वहीं, दिल्ली में यह आंकड़ा सबसे कम है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की निचली अदालतों में केवल 13 प्रतिशत जज OBC, SC या ST वर्ग से हैं। सरकार ने संकेत दिया कि दिल्ली की तरह कुछ अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी यह अनुपात अपेक्षाकृत कम है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में क्यों नहीं हैं पूरे आंकड़े?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को लेकर स्थिति अलग है। कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि संविधान में उच्च न्यायपालिका की नियुक्तियों के लिए किसी भी प्रकार का आरक्षण प्रावधान नहीं है। इसी वजह से केंद्र सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मौजूदा जजों का जाति या वर्ग आधारित आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, 2018 से एक नई प्रक्रिया लागू की गई, जिसके तहत हाई कोर्ट के जज पद के लिए सिफारिश किए गए उम्मीदवारों को एक निर्धारित प्रारूप में अपना सामाजिक पृष्ठभूमि विवरण देना होता है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट की सलाह से तैयार की गई थी।
2018 के बाद हाई कोर्ट में प्रतिनिधित्व की झलक
2018 से अब तक हाई कोर्ट में नियुक्त किए गए 847 जजों के आंकड़े उपलब्ध हैं। इनमें:
- 104 जज OBC वर्ग से
- 33 जज अनुसूचित जाति (SC) से
- 17 जज अनुसूचित जनजाति (ST) से
- 46 जज अल्पसंख्यक वर्ग से हैं
इसके अलावा, इसी अवधि में 130 महिलाओं को भी हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया, जिसे लैंगिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

क्या संकेत देते हैं ये आंकड़े?
निचली अदालतों में आरक्षित वर्गों की बढ़ती भागीदारी यह दिखाती है कि न्यायिक सेवाओं में सामाजिक समावेशन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। हालांकि, राज्यों के बीच भारी असमानता यह भी दर्शाती है कि एक समान प्रतिनिधित्व अभी भी दूर की बात है, खासकर महानगरों और कुछ उत्तर भारतीय क्षेत्रों में।
- प्रमुख राज्यों में लोअर जुडिशरी में आरक्षित वर्ग के जज (%)
- भारत (कुल) – 46%
- तमिलनाडु – 97.6%
- मेघालय – 95%
- पुडुचेरी – 88.5%
- कर्नाटक – 88%
- तेलंगाना – 69%
- आंध्र प्रदेश – 64%
- छत्तीसगढ़ – 63%
- केरल – 59%
- उत्तर प्रदेश – 54%
- मध्य प्रदेश – 49%
- राजस्थान – 45%
- पंजाब – 40%
- गुजरात – 29%
- हिमाचल प्रदेश – 29%
- दिल्ली – 13%
सरकार द्वारा साझा किए गए ये आंकड़े निचली न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। जहां कुछ राज्य समावेशिता के मामले में उदाहरण बन चुके हैं, वहीं कुछ क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है।










