उत्तराखंड के द्रोणागिरी गांव में पीढ़ियों से चली आ रही एक धार्मिक परंपरा आज भी निभाई जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुछ परिवार हर रात हनुमान जी की श्रद्धा में घरों के बाहर सात्त्विक भोजन अर्पित करते हैं, जिसका संबंध रामायण काल से जोड़ा जाता है।
Dronagiri Village Hanuman Tradition: उत्तराखंड का द्रोणागिरी गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ एक अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां कुछ परिवार हर रात हनुमान जी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए घरों के बाहर भोजन अर्पित करते हैं। इस परंपरा का संबंध रामायण काल की संजीवनी पर्वत कथा से जोड़ा जाता है।
रामायण की कथा से जुड़ी है द्रोणागिरी की मान्यता

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित द्रोणागिरी गांव धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस गांव का संबंध रामायण काल की उस प्रसिद्ध कथा से है, जब लंका युद्ध के दौरान लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके उपचार के लिए संजीवनी बूटी लाने का दायित्व हनुमान जी को सौंपा गया था। मान्यता है कि संजीवनी की पहचान न होने पर हनुमान जी पूरा पर्वत ही उठाकर ले गए। इसी कथा के कारण द्रोणागिरी क्षेत्र को आज भी धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है।
ग्रामीणों का विश्वास है कि यह केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यही कारण है कि यहां कई धार्मिक परंपराएं आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही हैं।
आज भी निभाई जाती है भोजन अर्पित करने की परंपरा
द्रोणागिरी गांव के कुछ परिवार आज भी हर रात भोजन करने के बाद हनुमान जी की श्रद्धा में घर के बाहर या किसी पवित्र स्थान पर सात्त्विक भोजन का एक छोटा हिस्सा रखते हैं। इस प्रसाद में सामान्यतः रोटी, फल या अन्य सात्त्विक खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह कोई बड़ा धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा और श्रद्धा व्यक्त करने का एक सरल माध्यम है।
ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा को निभाने से गांव में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। यह परंपरा वर्षों से बिना किसी दिखावे के लगातार निभाई जा रही है और नई पीढ़ी भी इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ा रही है।
आस्था के साथ जुड़ा है सांस्कृतिक संदेश
द्रोणागिरी की यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोक संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन का भी महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है। यहां के लोगों का मानना है कि सच्ची भक्ति केवल बड़े मंदिरों या भव्य आयोजनों तक सीमित नहीं होती, बल्कि छोटे-छोटे सत्कर्म और नियमित श्रद्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
यह परंपरा लोगों को प्रकृति, संस्कृति और धार्मिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। ग्रामीणों के अनुसार उनके पूर्वजों से मिली यह विरासत आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जा रही है, जिससे गांव की धार्मिक पहचान बनी हुई है।
हालांकि, इस परंपरा से जुड़ी मान्यताएं स्थानीय धार्मिक विश्वासों और लोककथाओं पर आधारित हैं। इन्हें ऐतिहासिक या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि द्रोणागिरी गांव आज भी देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।










