ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष से चीन की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार पर असर दिखने लगा है। स्ट्रेट ऑफ होरमुज मार्ग प्रभावित हुआ, जिससे तेल सप्लाई बाधित होने का खतरा बढ़ गया और निवेश जोखिम में आया।
Middle East War Impact: पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष का असर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन पर भी दिखने लगा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध ने चीन की तेल सप्लाई, व्यापारिक गतिविधियों और अरबों डॉलर के निवेश को जोखिम में डाल दिया है। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व पर निर्भर है और इस क्षेत्र से आने वाला तेल उसकी आवश्यकताओं का आधा से अधिक हिस्सा पूरा करता है।
ईरान से सस्ता तेल अब चुनौती
पिछले कुछ सालों में चीन ने ईरान से सस्ता तेल खरीदा, जिससे उसके ऊर्जा खर्च में कमी आई। लेकिन अब अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद यदि ईरान से तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो चीन को दूसरे देशों से महंगे दाम पर तेल खरीदना पड़ेगा। इससे चीन के ऊर्जा खर्च में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होरमुज से सप्लाई खतरे में
इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ होरमुज पर पड़ा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक मार्गों में से एक है। इसी रास्ते से तेल, गैस और कंटेनर जहाजों के जरिए बड़े पैमाने पर सामान दुनिया भर में पहुंचता है। हालिया तनाव के कारण इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे चीन के तेल आयात और व्यापारिक माल की ढुलाई पर भी असर पड़ सकता है।
मध्य पूर्व चीन के लिए तेजी से बढ़ता बाजार

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में मध्य पूर्व चीन के लिए तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन गया है। अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ने के बाद चीन ने इस क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। संयुक्त अरब अमीरात चीन की कारों के लिए सबसे तेजी से बढ़ता बाजार बन गया है। वहीं सऊदी अरब और आसपास के देशों में चीनी इस्पात की मांग भी काफी बढ़ी है। 2025 में चीन का मध्य पूर्व को निर्यात बाकी दुनिया की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ा।
अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट
चीन ने पिछले कुछ सालों में मध्य पूर्व में बड़े निवेश किए हैं। विश्लेषकों के मुताबिक 2019 से 2024 के बीच चीन ने इस क्षेत्र में करीब 89 अरब डॉलर का निवेश किया। इसमें बंदरगाह, ऊर्जा परियोजनाएं, बिजली से जुड़े ढांचे और पेट्रोकेमिकल प्लांट शामिल हैं। कतर की LNG परियोजना, इजरायल का हैफा पोर्ट और यूएई का खलीफा पोर्ट चीन की कंपनियों के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट हैं। यदि संघर्ष लंबा चलता है तो इन निवेशों पर जोखिम बढ़ सकता है।
टेक कंपनियों की मौजूदगी
केवल ऊर्जा और बुनियादी ढांचा ही नहीं, चीन की तकनीकी कंपनियां भी मध्य पूर्व में तेजी से विस्तार कर रही हैं। हुआवे, अलीबाबा और टेनसेंट ने दुबई में अपने कार्यालय स्थापित किए हैं। शाओमी, ऑनर और ट्रांसियन जैसे स्मार्टफोन ब्रांड भी इस क्षेत्र में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
संघर्ष के बढ़ने के बाद कई चीनी कंपनियों ने कर्मचारियों को घर से काम करने के निर्देश दिए हैं। बाइडू ने संयुक्त अरब अमीरात में अपनी रोबोटैक्सी सेवा अस्थायी रूप से रोक दी है। अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी सेवाओं को सीमित करने की तैयारी की है।
चीन इस समय कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय है। विदेश मंत्री वांग यी ने ईरान, इजरायल, ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं से बातचीत कर संघर्ष को रोकने का प्रयास किया है। चीन का उद्देश्य इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक और व्यापारिक रुचियों को सुरक्षित रखना है।











