अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पूर्व CJI एन वी रमन्ना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में महिला जजों की संख्या अभी भी कम है। उन्होंने संवैधानिक अदालतों में लैंगिक समानता को लेकर सरकार के रवैये पर सवाल उठाए।
New Delhi: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर देश की न्याय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक अहम चर्चा सामने आई। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एन वी रमन्ना ने कहा कि भारत की संवैधानिक अदालतों में लैंगिक समानता को लेकर सरकार का मजबूत इरादा दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि जहां ट्रायल कोर्ट स्तर पर महिला जजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में महिलाओं की नियुक्ति अभी भी काफी कम है।
नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह बात कही। यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट परिसर में आयोजित ‘इंडियन विमेन इन लॉ’ के पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस का हिस्सा था। इस दौरान आयोजित सवाल-जवाब सत्र में उन्होंने न्यायपालिका में महिलाओं की स्थिति और उनके प्रतिनिधित्व को लेकर विस्तार से अपनी राय रखी।
संवैधानिक अदालतों में महिलाओं की संख्या अब भी कम
पूर्व चीफ जस्टिस एन वी रमन्ना ने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट में महिलाओं की भागीदारी करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। यह एक सकारात्मक संकेत है और इससे पता चलता है कि न्याय व्यवस्था के शुरुआती स्तर पर महिलाओं को अवसर मिल रहे हैं।
लेकिन जब बात सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की आती है तो स्थिति बिल्कुल अलग नजर आती है। इन अदालतों में महिला जजों की संख्या अभी भी बहुत कम है। उनका कहना था कि अगर ट्रायल कोर्ट में इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं जज बन सकती हैं तो फिर ऊंची अदालतों में उनकी संख्या क्यों नहीं बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि इससे साफ लगता है कि संवैधानिक अदालतों में लैंगिक संतुलन लाने को लेकर गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
सरकार के रवैये पर उठाए सवाल
अपने बयान में रमन्ना ने सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में महिला जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार ने कई बार लापरवाही वाला रवैया अपनाया है।
उनका कहना था कि अगर सरकार सच में लैंगिक समानता को बढ़ावा देना चाहती है तो उसे उच्च न्यायालयों में महिलाओं की नियुक्ति को प्राथमिकता देनी चाहिए। लेकिन अभी तक इस दिशा में उतनी तेजी से कदम नहीं उठाए गए हैं जितनी जरूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका में संतुलित प्रतिनिधित्व होना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे न्याय प्रणाली अधिक मजबूत और संवेदनशील बनती है।
अपने कार्यकाल का भी किया जिक्र
पूर्व चीफ जस्टिस एन वी रमन्ना ने अपने कार्यकाल को भी याद किया। उनका कार्यकाल अप्रैल 2021 से अगस्त 2022 तक रहा था। उन्होंने बताया कि उस समय कई चुनौतियों और दबावों के बावजूद तीन महिला जजों की नियुक्ति हुई थी।
उनके कार्यकाल के दौरान जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस बी वी नागरत्ना ने सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली थी। यह न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
उन्होंने कहा कि उस समय कई तरह की खींचतान और चर्चा के बावजूद इन नियुक्तियों को संभव बनाया गया था। लेकिन उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में किसी नई महिला जज की नियुक्ति नहीं हुई है।
देश को मिलने वाली है पहली महिला मुख्य न्यायाधीश
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक ऐतिहासिक घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जस्टिस बी वी नागरत्ना अगले साल 24 सितंबर को देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली हैं।
यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि होगी। अब तक देश में किसी महिला ने मुख्य न्यायाधीश का पद नहीं संभाला है। ऐसे में जस्टिस नागरत्ना का इस पद तक पहुंचना कई महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जा रहा है।
रमन्ना ने कहा कि यह न्यायपालिका में बदलाव का संकेत भी हो सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में महिलाओं की संख्या और बढ़ेगी।
भविष्य में बढ़ सकती है महिला जजों की संख्या
अपने संबोधन के दौरान रमन्ना ने यह भी कहा कि आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की संख्या बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में भविष्य के दो मुख्य न्यायाधीश मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि जस्टिस बी वी नागरत्ना के बाद जस्टिस पी एस नरसिम्हा देश के मुख्य न्यायाधीश बनेंगे। दोनों के सामने बोलते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में कम से कम 7 से 8 महिला जजों की नियुक्ति हो सकती है।
महिला वकीलों के नामों की सिफारिश पर भी चर्चा
पूर्व सीजेआई ने यह भी बताया कि समय-समय पर कानून मंत्रियों ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से महिला वकीलों और न्यायिक अधिकारियों के नाम सुझाने के लिए कहा था। इन नामों को हाई कोर्ट जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की जाती थी।
लेकिन उनका कहना है कि इन सिफारिशों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अगर इन सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाता तो आज उच्च न्यायालयों में महिला जजों की संख्या कहीं अधिक हो सकती थी।











