सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश: पति की सैलरी से कटेगा गुजारा भत्ता, नाबालिग बेटी और पत्नी के लिए सीधे बैंक खाते में होगा ट्रांसफर

सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश: पति की सैलरी से कटेगा गुजारा भत्ता, नाबालिग बेटी और पत्नी के लिए सीधे बैंक खाते में होगा ट्रांसफर

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में पति के एंप्लॉयर को निर्देश दिया है कि उसकी मासिक सैलरी से 25,000 रुपये काटकर सीधे पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाएँ। यह राशि पत्नी और उनकी चार साल की नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी। 

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में एक व्यक्ति के एंप्लॉयर (नियोक्ता) को निर्देश दिया है कि उसकी मासिक सैलरी में से 25,000 रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाएं। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग चार साल की बेटी के भरण-पोषण और देखभाल के लिए दी जाएगी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अगुवाई वाली पीठ ने यह आदेश पिछले सप्ताह सुनाया। 

अदालत ने अपने फैसले में पाया कि पति 2022 से अपनी पत्नी से अलग रह रहा है, लेकिन अब तक उसने पत्नी और बेटी के लिए कोई गुजारा भत्ता नहीं दिया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बच्ची की पूरी जिम्मेदारी और देखभाल फिलहाल उसकी मां ही कर रही है, और इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उसे नियमित और पर्याप्त वित्तीय सहायता मिले।

मामले का संक्षिप्त विवरण

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अगुवाई वाली पीठ ने यह आदेश सुनाया। अदालत ने पाया कि पति 2022 से अपनी पत्नी से अलग रह रहा है, लेकिन पिछले चार वर्षों में पत्नी और बेटी के लिए गुजारा भत्ता नहीं दिया। अदालत ने नोट किया कि बच्ची की सारी जिम्मेदारी उसकी मां ने अकेले उठाई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पिछले चार वर्षों में पति ने न केवल बच्चे के पालन-पोषण में कोई आर्थिक योगदान नहीं दिया बल्कि उनसे मिलने की कोशिश भी नहीं की। 

इससे पहले मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, और अंतरिम व्यवस्था के तहत पति को पत्नी और बेटी के यात्रा खर्च के लिए 25,000 रुपये जमा करने के निर्देश दिए गए थे।

पति का असंतोष और अदालत की सख्ती

अंतरिम आदेश का पालन न करने पर पति ने अदालत को बताया कि उसकी मासिक आय 50,000 रुपये है और वह आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है। अदालत ने उससे पूछा कि क्या वह 2.5 लाख रुपये जमा करने के लिए तैयार है, जिसमें पिछली बकाया राशि भी शामिल है, लेकिन पति ने इनकार कर दिया।

इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए नियोक्ता को निर्देश दिया कि वे पति की सैलरी से हर महीने 25,000 रुपये काटकर RTGS के माध्यम से सीधे पत्नी के खाते में भेजें।

सुप्रीम कोर्ट का तात्कालिक उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से नाबालिग बेटी के कल्याण और उसकी मां की स्थिति पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि मां अकेले बच्चे का पालन-पोषण कर रही है और पति की ओर से आर्थिक योगदान न होना गंभीर मामला है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने के लिए आदेश दिया कि इस फैसले के अनुपालन की रिपोर्ट अप्रैल महीने में अदालत में पेश की जाए। इस आदेश का महत्व केवल इस परिवार तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि:

  • नाबालिग बच्चों के पालन-पोषण में पिता की जिम्मेदारी कानूनी और नैतिक रूप से अनिवार्य है।
  • यदि पति खुद गुजारा भत्ता देने में असमर्थ है, तो अदालत उनके नियोक्ता के माध्यम से सैलरी से कटौती का आदेश दे सकती है।
  • यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में नजीर बनेगा, जहाँ पति गुजारा भत्ता देने से बचने की कोशिश करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश यह संदेश देता है कि गुजारा भत्ता और बच्चों की देखभाल के मामलों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग और उनकी मां की भरण-पोषण की सुरक्षा सर्वोपरि है।

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