गोरखपुर शहर में कैंसर से जूझ रहे मरीजों ने खुलासा किया है कि अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं को लिखे जाने के बजाय, उन्हें बाहर से दवाएं खरीदने को मजबूर किया जा रहा है। नतीजतन — दवा खर्च, दर्द और मानसिक कष्ट, सभी बढ़ रहे हैं।
एक मरीज को अस्पताल से मुफ्त मिलने वाली दवाएं मिलनी थीं, लेकिन पर्चे पर दूसरी दवाओं का नाम लिखने के कारण उसे करीब 12 हजार रुपये खर्च करके दवा खरीदनी पड़ी। बाद में जब उन्होंने प्रतिपूर्ति की मांग की, तो दावा अस्वीकार कर दिया गया — कहा गया कि दवाएं अस्पताल में उपलब्ध थीं।
कई अन्य मरीजों ने भी शिकायत की कि सहूलियत-देने का नाम मात्र है — असल में दवाईयाँ महंगी ब्रांड-नाम पर लिखी जा रही हैं, जबकि सस्ती जेनरिक दवाएं अस्पताल की फार्मेसी में उपलब्ध हैं।
आरोप है कि कुछ डॉक्टर और दवा कंपनियाँ मिलकर इस व्यवस्था का हिस्सा बन रही हैं, जिससे मरीजों का आर्थिक बोझ और शारीरिक पीड़ा — दोनों बढ़ रही हैं।
कैंसर जैसे जानलेवा रोग में दवाओं की पहुँच और उचित उपचार जीवन-मूल्य होते हैं। लेकिन जब अस्पतालों में मौजूद दवाओं के बावजूद मरीजों को बाहर से खरीदने को मजबूर किया जाता है, तो यह सिर्फ चिकित्सा असुविधा नहीं, न्याय-घाटा भी बन जाता है।
मरीज़ों और उनके परिजनों का कहना है कि अस्पतालों और शासन को चाहिए कि: पर्चों पर सिर्फ “फार्मास्यूटिकल नाम” लिखे जाएँ — ताकि मरीज सस्ती दवाएं जेनरिक रूप से ले सकें। अस्पताल की दवा-फार्मेसी में जो दवाईयाँ उपलब्ध हैं, उनका इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए न कि महँगे ब्रांड-नाम वाली दवाओं का रुझान हो।
यदि मरीजों को बाहर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं, तो शासन से सहायता राशि समय से मिले और दवाईयों के बिल का पूरा भुगतान हो।
ऐसे हालात में सरकार, अस्पताल प्रशासन और चिकित्सा समिति — सभी की जिम्मेदारी बनती है कि कैंसर जैसे संवेदनशील रोग से जूझ रहे लोगों को परेशान न किया जाए, बल्कि इलाज और दवाईयों तक पहुँच आसान बनाई जाए।











