उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने दलित वोट बैंक को साधने की कवायद तेज कर दी है। इसी क्रम में पार्टी ने कांशीराम की जयंती को लेकर बड़ा ऐलान किया है।
UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) ने दलित और पिछड़े वर्गों को साधने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पार्टी ने ऐलान किया है कि इस वर्ष कांशीराम जयंती को ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य की राजनीति में दलित वोटों को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो चुकी है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि 15 मार्च को प्रदेश के हर जिले में कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
क्या है पीडीए फॉर्मूला?
पीडीए का अर्थ है—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। अखिलेश यादव ने 2024 के आम चुनाव के दौरान इस सामाजिक समीकरण को राजनीतिक रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया था। पार्टी का दावा है कि इस फॉर्मूले का सकारात्मक असर देखने को मिला और सपा को बड़ी संख्या में ओबीसी तथा दलित समुदाय का समर्थन प्राप्त हुआ।
अब इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए सपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सामाजिक रूप से विविध राज्य में जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों पर निर्णायक प्रभाव डालते हैं।

कांशीराम की विरासत को केंद्र में रखने की कोशिश
कांशीराम, जो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक थे, भारतीय राजनीति में दलित आंदोलन के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। सपा द्वारा जारी पत्र में उल्लेख किया गया है कि कांशीराम ने मंडल आयोग की सिफारिशों के समर्थन में देशव्यापी आंदोलन चलाया था और सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी थी।
सपा नेतृत्व ने यह भी याद दिलाया कि 1993 में कांशीराम और पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बीच गठबंधन हुआ था, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाया। उस दौर में सामाजिक न्याय और बहुजन एकता की राजनीति को मजबूत आधार मिला था।
हर जिले में कार्यक्रम और श्रद्धांजलि सभाएं
पार्टी के निर्देशानुसार, 15 मार्च को पूरे प्रदेश में ‘पीडीए दिवस’ के रूप में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में कांशीराम को श्रद्धांजलि दी जाएगी और सामाजिक न्याय, भाईचारा तथा समान प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। सपा का उद्देश्य इन आयोजनों के माध्यम से दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को एक मंच पर लाना है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध है और बहुजन विचारधारा का सम्मान करती है।
हाल के वर्षों में बसपा की चुनावी ताकत में आई कमी के बाद दलित वोटबैंक को लेकर अन्य दलों की सक्रियता बढ़ी है। सपा लगातार यह संकेत देने की कोशिश कर रही है कि वह दलितों और वंचित वर्गों की वास्तविक हितैषी है।











