उत्तराखंड के लोकभवन से राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल राज्य में नवाचार, तकनीक, शिक्षा और युवाओं को नए अवसरों से जोड़ने की पहल के लिए याद किया जाएगा। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड लंबे समय से पलायन की चुनौती का सामना कर रहा है। रोजगार, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेहतर जीवन की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शहरों की ओर जाते रहे हैं। ऐसे में गांवों में ही आजीविका के अवसर विकसित करना, युवाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ना और स्थानीय संसाधनों को रोजगार का आधार बनाना राज्य के विकास के महत्वपूर्ण विषय रहे हैं।
राज्यपाल के रूप में गुरमीत सिंह ने लोकभवन को केवल संवैधानिक गतिविधियों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी नवाचार और सामाजिक सहभागिता से जुड़े विषयों पर संवाद के मंच के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किया। उनके कार्यकाल से जुड़ी पहलों में युवाओं की प्रतिभा को प्रोत्साहित करना, विश्वविद्यालयों में शोध और नवाचार को बढ़ावा देना तथा उत्तराखंड की स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकास की संभावनाओं पर ध्यान देना प्रमुख रहा। पहाड़ी राज्य में विकास की चुनौतियां मैदानी क्षेत्रों से अलग हैं। यहां भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित परिवहन सुविधाएं, बिखरी हुई आबादी और रोजगार के कम विकल्प कई बार स्थानीय लोगों को दूसरे क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर करते हैं।
राज्यपाल गुरमीत सिंह ने 15 सितंबर 2021 को उत्तराखंड के राज्यपाल का पद संभाला था और 15 सितंबर 2026 को उनके कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे हुए। उनके कार्यकाल के दौरान पांच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया—पलायन रोकना, महिला सशक्तीकरण और बालिका शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं तकनीक, जैविक व प्राकृतिक खेती तथा वेलनेस। इन प्राथमिकताओं के जरिए राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास को स्थानीय जरूरतों से जोड़ने की कोशिश की गई।
तकनीक के क्षेत्र में लोकभवन में एआई आधारित स्मार्ट ऑटोमेशन, ई-पास, ऑनलाइन प्रबंधन प्रणाली, डिजिटल डैशबोर्ड, लाइब्रेरी मैनेजमेंट सिस्टम और ई-ऑफिस जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं। इनका उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और प्रभावी बनाना था। लोकभवन का वर्चुअल टूर भी तैयार किया गया, जिसके माध्यम से लोग परिसर के विभिन्न हिस्सों को डिजिटल माध्यम से देख सकते हैं। परिसंपत्तियों के प्रबंधन में बारकोड आधारित व्यवस्था शुरू करने की पहल भी की गई। इन बदलावों से प्रशासन में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का प्रयास दिखाई देता है।
गुरमीत सिंह ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को केवल आधुनिक तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि पहाड़ी राज्य की समस्याओं के समाधान के संभावित साधन के रूप में प्रस्तुत किया। उत्तराखंड में दुर्गम गांवों तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना, आपदा के जोखिम का आकलन करना, कृषि में बेहतर जानकारी उपलब्ध कराना और पर्यटन को व्यवस्थित करना ऐसी चुनौतियां हैं, जिनमें तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। उनका जोर इस बात पर रहा कि तकनीकी सुविधाएं केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों तक भी पहुंचें।
इसी दिशा में 14 मई 2026 को लोकभवन में एआई थीम रूम का उद्घाटन किया गया और ‘एआई ऑन व्हील्स’ वाहन को रवाना किया गया। इसका मकसद लोगों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इस तकनीक को अधिक व्यापक स्तर पर परिचित कराना था। इसके बाद 29 जुलाई को ‘ऑपरेशन साथी’, ‘आरोही इन्क्यूबेटर’ और एआई न्यूजलेटर की शुरुआत की गई। इन पहलों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मौजूद प्रतिभाशाली युवाओं के विचारों को पहचानने, उन्हें विशेषज्ञों का मार्गदर्शन देने और उपयोगी नवाचार को स्टार्टअप में बदलने के लिए प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गा आरोही इन्क्यूबेटर’ का उद्देश्य युवाओं के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है, जहां उन्हें मेंटरशिप, तकनीकी सलाह और जरूरी संसाधनों तक पहुंच मिल सके। उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय समस्याओं पर आधारित नवाचार के लिए काफी संभावनाएं हैं। उदाहरण के तौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में खेती, फल उत्पादन, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और दूरस्थ इलाकों में सेवाएं पहुंचाने से जुड़ी समस्याओं पर तकनीक आधारित समाधान विकसित किए जा सकते हैं। ऐसे प्रयासों से युवाओं को अपने राज्य में ही उद्यम शुरू करने के विकल्प तलाशने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, किसी भी इन्क्यूबेशन पहल का दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि युवाओं के विचार कितने सफल व्यवसायों में बदलते हैं और उनसे कितने स्थायी रोजगार पैदा होते हैं।
राज्यपाल की प्राथमिकताओं में पलायन रोकना भी शामिल रहा। उत्तराखंड के कई पर्वतीय गांवों में रोजगार के सीमित अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच की कठिनाई तथा बाजारों से दूरी जैसी समस्याएं लोगों को शहरों की ओर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। पलायन की समस्या का समाधान केवल लोगों से गांव में रहने की अपील करने से नहीं हो सकता। इसके लिए गांवों में आय के टिकाऊ साधन, बेहतर बुनियादी सुविधाएं, स्थानीय उत्पादों के लिए बाजार और युवाओं के लिए काम के अवसर विकसित करना जरूरी है। राज्यपाल के स्तर पर इस विषय को प्राथमिकता देना ग्रामीण विकास और स्थानीय आजीविका की चर्चा को आगे बढ़ाने का एक प्रयास रहा।
पलायन रोकने के साथ-साथ रिवर्स माइग्रेशन यानी गांवों की ओर वापसी को भी उनके प्रमुख मिशन में शामिल किया गया। इसका विचार यह है कि जो लोग रोजगार या अन्य कारणों से अपने गांव छोड़ चुके हैं, वे अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर वापस लौटकर अपने क्षेत्र में काम या व्यवसाय शुरू कर सकें। इसके लिए कृषि और बागवानी, औषधीय पौधों की खेती, स्थानीय उत्पादों के प्रसंस्करण, पर्यटन और छोटे उद्यमों में संभावनाएं विकसित करना महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन स्थायी बदलाव के लिए सरकारी योजनाओं, स्थानीय निकायों, वित्तीय संस्थानों और बाजार से जुड़ी व्यवस्थाओं का सहयोग भी जरूरी है
राज्यपाल ने सीमावर्ती क्षेत्रों और दूरस्थ गांवों की स्थिति को समझने के लिए जिलों का दौरा भी किया। लोकभवन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, उनके पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने राज्य के सभी जिलों में कई बार जाकर अधिकारियों और स्थानीय लोगों से बातचीत की। राज्य के 51 वाइब्रेंट विलेज में से 30 गांवों का दौरा कर वहां के निवासियों, युवाओं और पूर्व सैनिकों से मुलाकात की गई। ऐसे संवादों का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों की जरूरतों, स्थानीय समस्याओं और विकास की संभावनाओं को समझना था।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी विश्वविद्यालयों के बीच शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करने पर ध्यान दिया गया। राज्य और निजी विश्वविद्यालयों को सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े विषयों पर शोध करने तथा अपने अनुभव और उपलब्धियां साझा करने के लिए प्रेरित किया गया। ‘वन यूनिवर्सिटी, वन रिसर्च’ जैसी पहल का उद्देश्य शैक्षणिक शोध को राज्य की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना था। विश्वविद्यालयों में तैयार होने वाला शोध तब अधिक उपयोगी बन सकता है, जब उसके निष्कर्षों को नीति निर्माण, स्थानीय उद्योग, कृषि और समाज की जरूरतों के अनुरूप लागू करने की दिशा में काम हो।
10 अक्टूबर 2026 को लोकभवन में ‘उत्तराखंड डीप-टेक 2030: बिल्डिंग टेक्नोलॉजी फॉर द माउंटेन्स’ कार्यक्रम का उद्घाटन भी किया गया। इसमें विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, रक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों, उद्यमियों और तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में पहाड़ों की परिस्थितियों के अनुरूप कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती तकनीकों का इस्तेमाल करने पर चर्चा हुई। आपदा प्रबंधन, शिक्षा, उद्यमिता, आजीविका और सीमावर्ती क्षेत्रों की जरूरतों के लिए तकनीकी समाधान विकसित करना इस पहल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल बताया गया
गुरमीत सिंह का कार्यकाल ऐसे समय में रहा, जब दुनिया भर में तकनीक तेजी से बदल रही है और राज्य सरकारों के सामने डिजिटल सेवाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ स्थानीय रोजगार बढ़ाने की चुनौती भी है। उत्तराखंड के लिए यह सवाल खास महत्व रखता है कि आधुनिक तकनीक और नवाचार का लाभ पहाड़ के दूरस्थ इलाकों तक कैसे पहुंचे। यदि स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, पूंजी और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था मजबूत होती है, तो वे अपने क्षेत्र में ही रोजगार पैदा करने वाले उद्यम विकसित कर सकते हैं। इससे पलायन के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है, हालांकि केवल तकनीक से इस समस्या का पूरा समाधान संभव नहीं है।
12 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति की ओर से उत्तराखंड के नए राज्यपाल के रूप में ढाल सिंह बिसेन की नियुक्ति की घोषणा की गई। इस बदलाव के साथ गुरमीत सिंह के कार्यकाल की पहलों और उनकी प्राथमिकताओं पर चर्चा बढ़ी है। नियुक्ति के औपचारिक रूप से प्रभावी होने की प्रक्रिया के बीच उनके पांच वर्षों के कार्यकाल को तकनीक, युवाओं, महिला सशक्तीकरण, उच्च शिक्षा और पलायन जैसे विषयों पर केंद्रित पहलों के संदर्भ में देखा जा रहा है
उत्तराखंड के विकास के लिए इन पहलों की असली कसौटी उनके दीर्घकालिक नतीजे होंगे—क्या गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, क्या युवा स्थानीय स्तर पर उद्यम शुरू कर पाते हैं, क्या लड़कियों को शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण का अधिक लाभ मिलता है और क्या नई तकनीक आम लोगों की समस्याओं का समाधान कर पाती है। लोकभवन से शुरू किए गए नवाचारों ने इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है। अब इन प्रयासों को स्थायी परिणामों में बदलने के लिए सरकार, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और स्थानीय समुदायों के बीच निरंतर सहयोग महत्वपूर्ण रहेगा।










