यामी गौतम और इमरान हाशमी की फिल्म 'हक', जो शाह बानो केस पर आधारित कोर्टरूम ड्रामा है, 2 जनवरी 2026 को Netflix पर रिलीज़ होगी। यह फिल्म महिलाओं के अधिकार, समाज और कानून के बीच संघर्ष को दिखाती है।
Haq OTT Release Date: यामी गौतम और इमरान हाशमी की फिल्म 'हक' ने 7 नवंबर, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होकर दर्शकों और क्रिटिक्स के बीच चर्चा बटोरी। यह फिल्म 1985 के ऐतिहासिक शाह बानो केस से प्रेरित एक गहन कोर्टरूम ड्रामा है, जिसमें महिलाओं के अधिकार और समाज में उनके संघर्ष को प्रमुखता से दिखाया गया है। फिल्म की कहानी तीन तलाक और गुजारा भत्ता के मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती है और यह दर्शाती है कि एक महिला अपने हक के लिए कितनी लड़ाई लड़ सकती है।
यामी गौतम ने निभाया शाह बानो का किरदार
फिल्म में यामी गौतम ने शाजिया बानो का किरदार निभाया है। उनकी एक्टिंग को दर्शकों और समीक्षकों ने काफी सराहा। इमरान हाशमी ने शाजिया के पति का रोल निभाया है, जो कहानी में उनका विरोधाभासी और चुनौतीपूर्ण किरदार पेश करता है। यामी और इमरान पहली बार इस तरह के गंभीर कोर्टरूम ड्रामा में साथ नजर आए हैं, जिससे फिल्म में कहानी की गहराई और संवेदनशीलता बढ़ी है।
यामी गौतम की शाजिया के रूप में प्रस्तुति ने महिलाओं के अधिकारों और समाज में उनके सम्मान की लड़ाई को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया। उनके किरदार की मजबूती और इमरान हाशमी के अभिनय ने फिल्म को और भी यादगार बना दिया।

OTT पर कब और कहां देखें 'हक'
फिल्म 2 जनवरी, 2026 को Netflix पर रिलीज होने वाली है। यह दर्शकों के लिए एक बेहतरीन मौका है कि वे घर बैठे इस सामाजिक और ऐतिहासिक फिल्म को देख सकें। फिल्म का विषय महिलाओं के अधिकार, लैंगिक समानता, धर्म और व्यक्तिगत पहचान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित है।
फिल्म का निर्देशन सुपन वर्मा ने किया है और पटकथा रेशु नाथ ने लिखी है। यह फिल्म सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं बल्कि महिलाओं के अधिकारों और धर्म एवं कानून के बीच टकराव को भी दिखाती है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि एक महिला को अपने हक के लिए समाज और धार्मिक बाधाओं के बावजूद कैसे संघर्ष करना पड़ता है।
जानें 'हक' की कहानी
फिल्म की कहानी शाजिया बानो (यामी गौतम) के जीवन पर आधारित है। वह एक गृहिणी हैं, जिनका जीवन उनके वकील पति अब्बास (इमरान हाशमी) के साथ शुरू होता है। शादी के शुरुआती सालों में पति उन्हें और उनके बच्चों को छोड़कर चले जाते हैं और आर्थिक मदद देना बंद कर देते हैं। वह तीन तलाक के जरिए शाजिया को तलाक दे देते हैं।
इसके बाद शाजिया अपने गुजारा भत्ते के लिए अदालत का रुख करती हैं। उनकी यह व्यक्तिगत लड़ाई 1980 के दशक के भारत में महिलाओं के अधिकारों, धर्म और न्याय पर एक राष्ट्रीय बहस का रूप ले लेती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक महिला अपने हक के लिए न केवल समाज बल्कि कानूनी और धार्मिक बाधाओं से भी जूझती है।












