हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में रोजगार के अवसर पैदा करने और स्थानीय महिलाओं की प्रतिभा को पहचान दिलाने की एक प्रेरक कहानी सामने आई है। बड़े शहरों में बेहतर करियर और सुविधाओं की तलाश में गांव छोड़ने वाले युवाओं के बीच मंडी जिले की प्रवीण वर्मा और एकता शर्मा ने अलग राह चुनी। दोनों ने शहर की भागदौड़ से दूर हिमाचल के ग्रामीण इलाके में रहकर ऐसा उद्यम खड़ा करने की दिशा में काम किया, जिसका उद्देश्य केवल कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ना और पहाड़ी संस्कृति को नई पहचान देना भी है। उनके प्रयासों से जुड़ी पहल में ग्रामीण पर्यटन, पारंपरिक कपड़ों, बुनाई, कढ़ाई और स्थानीय महिलाओं के हुनर को बाजार तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। इस उद्यम से सैकड़ों परिवारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका के अवसर मिलने की बात सामने आई है।
इस पहल के केंद्र में प्रवीण वर्मा हैं, जिन्होंने हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के मुरहाग गांव में अपना बचपन बिताया। पढ़ाई और करियर के सिलसिले में वह बेंगलुरु पहुंचीं, जहां उन्होंने कॉरपोरेट क्षेत्र में काम किया। बड़े शहर में नौकरी और बेहतर पेशेवर अवसर होने के बावजूद उनका जुड़ाव अपने पहाड़ों और वहां के लोगों से बना रहा। गांवों में मौजूद प्राकृतिक सुंदरता, स्थानीय संस्कृति और लोगों के हुनर को बड़े स्तर पर पहचान दिलाने की इच्छा ने उन्हें वापस लौटने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने लिए ऐसा रास्ता तलाशना शुरू किया, जिसमें पहाड़ों में रहकर काम करने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय की आय बढ़ाने की संभावना भी हो।
प्रवीण ने वर्ष 2021 में मंडी जिले के भदौन गांव में जमीन खरीदी थी। हालांकि, उस समय उनके पास इस बात की पूरी योजना नहीं थी कि वहां किस तरह का व्यवसाय शुरू किया जाएगा। कुछ समय बाद उन्होंने अपने पति और छोटे बेटे के साथ गांव में बसने का फैसला किया। वर्ष 2024 की शुरुआत में उन्होंने बेंगलुरु छोड़कर हिमाचल में रहना शुरू किया। शहर से गांव लौटने का यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में सुविधाओं की सीमाएं, बाजार तक पहुंचने की कठिनाइयां और कारोबार के लिए ग्राहकों का भरोसा जीतने जैसी चुनौतियां सामने थीं। इसके बावजूद उन्होंने स्थानीय लोगों को साथ लेकर काम शुरू करने पर ध्यान दिया।
प्रवीण की सोच थी कि हिमाचल के पहाड़ केवल घूमने-फिरने की जगह नहीं हैं, बल्कि यहां की संस्कृति, खानपान, लोककला और ग्रामीण जीवन भी लोगों के लिए खास आकर्षण बन सकते हैं। इसी विचार से उन्होंने ‘पहाड़न’ नाम से ग्रामीण पर्यटन और स्थानीय उत्पादों से जुड़ी पहल विकसित करनी शुरू की। इस उद्यम के तहत ‘पहाड़न्स विलेज’ और ‘पहाड़न्स गिल्ड प्राइवेट लिमिटेड’ के माध्यम से पर्यटन तथा पारंपरिक परिधानों से जुड़े काम को आगे बढ़ाया गया। इस मॉडल में स्थानीय लोगों को केवल सेवा देने वाले कर्मचारी के रूप में नहीं, बल्कि पूरे उद्यम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया।
शुरुआत में ग्रामीण पर्यटन की योजना के तहत एक कॉटेज बनाया गया। धीरे-धीरे यह पहल आगे बढ़ी और भदौन में लगभग पांच बीघा जमीन पर छह कॉटेज तैयार किए गए। यहां आने वाले मेहमानों को सामान्य होटल जैसी सुविधाओं तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय जीवन को करीब से समझने का अवसर दिया जाता है। पर्यटक गांवों में घूम सकते हैं, मिट्टी के बर्तन बनाने जैसी गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं, खेती-किसानी को जान सकते हैं और स्थानीय बुजुर्गों से कहानियां सुन सकते हैं। हिमाचली लोकनृत्य नाटी के जरिए भी मेहमानों को क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराया जाता है। इस तरह पर्यटन को स्थानीय संस्कृति और समुदाय की भागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
ग्रामीण पर्यटन की इस अवधारणा का उद्देश्य पर्यटकों को केवल प्राकृतिक नजारों तक सीमित न रखना, बल्कि उन्हें पहाड़ों के रोजमर्रा के जीवन से भी परिचित कराना है। आमतौर पर पर्यटन से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा होटल, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े कारोबारों तक पहुंचता है। लेकिन गांव आधारित पर्यटन में स्थानीय परिवारों, कलाकारों, किसानों और महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा किए जा सकते हैं। मेहमानों के आने से ठहरने, भोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आय के कई छोटे स्रोत विकसित होने की संभावना बनती है।
इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए प्रवीण ने स्थानीय महिलाओं के पारंपरिक कौशल की ओर भी ध्यान दिया। हिमाचल के कई इलाकों में महिलाएं पीढ़ियों से बुनाई, सिलाई, कढ़ाई और ऊनी कपड़े तैयार करने जैसे काम करती रही हैं। इन कामों में हुनर होने के बावजूद अक्सर महिलाओं को अपने उत्पादों के लिए नियमित बाजार नहीं मिल पाता। उत्पाद तैयार करने में समय और मेहनत लगती है, लेकिन बिक्री की सीमित व्यवस्था के कारण उनकी कमाई प्रभावित हो सकती है। प्रवीण ने इसी अंतर को कम करने के उद्देश्य से महिलाओं के बनाए कपड़ों को एक संगठित ब्रांड के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचाने की योजना पर काम किया।
इसी क्रम में ‘पहाड़न्स गिल्ड’ के तहत स्थानीय कारीगरों से स्वेटर, बुने हुए कपड़े और दूसरे परिधान तैयार कराने का काम आगे बढ़ाया गया। पारंपरिक हिमाचली पट्टियों और कढ़ाई से सजे कुर्तों को भी बाजार में अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इस तरह स्थानीय हस्तकला को आधुनिक परिधानों के साथ जोड़ने की कोशिश की गई, ताकि पारंपरिक डिजाइन आज के ग्राहकों के लिए भी आकर्षक बन सकें। इससे महिलाओं के हुनर को नया बाजार मिलने के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी आगे बढ़ाने का अवसर मिला।
इस उद्यम में एकता शर्मा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। एकता ने भी शहर की जिंदगी के बजाय पहाड़ों में रहकर काम करने का विकल्प चुना। वह शुरुआत में स्वयंसेवक के रूप में इस पहल से जुड़ी थीं। बाद में प्रवीण के साथ उनकी साझेदारी मजबूत हुई और वह कारोबार के प्रचार-प्रसार, सोशल मीडिया सामग्री तैयार करने तथा अन्य जिम्मेदारियों में योगदान देने लगीं। ब्रांड की पहचान को लोगों तक पहुंचाने में एकता की भूमिका खास रही है। उनके माध्यम से पहाड़ों की जिंदगी, स्थानीय महिलाओं के काम और ग्रामीण पर्यटन की गतिविधियों को डिजिटल मंचों पर प्रदर्शित किया जाता है। इससे दूर-दराज के इलाकों में तैयार होने वाले उत्पादों को शहरों और दूसरे बाजारों के ग्राहकों तक पहुंचाने में मदद मिली है।
सोशल मीडिया इस उद्यम के विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम बना। ग्रामीण क्षेत्र में कारोबार शुरू करने वाले लोगों के लिए बड़े बाजार तक पहुंच बनाना आसान नहीं होता। उत्पादों की बिक्री के लिए दुकानें खोलना, बड़े शहरों में जगह लेना और लगातार प्रचार करना महंगा साबित हो सकता है। ऐसे में इंस्टाग्राम, फेसबुक और अपनी वेबसाइट जैसे डिजिटल माध्यम छोटे उद्यमों को सीधे ग्राहकों से जोड़ने में मदद कर सकते हैं। प्रवीण और उनकी टीम ने इसी संभावना का इस्तेमाल किया। ऑनलाइन प्रचार के जरिए ग्रामीण पर्यटन के बारे में जानकारी साझा की गई और स्थानीय महिलाओं के तैयार किए कपड़ों को ग्राहकों तक पहुंचाने का रास्ता बनाया गया।
इस पहल के सामने कारोबार के विस्तार से जुड़ी चुनौतियां भी आईं। प्रवीण के अनुसार, एक समय उनके पास हाथ से बुने हुए करीब एक हजार स्वेटरों का स्टॉक जमा हो गया था और उन्हें यह समझना था कि इतनी बड़ी संख्या में उत्पादों को बाजार तक कैसे पहुंचाया जाए। सोशल मीडिया और वेबसाइट के माध्यम से इन उत्पादों की बिक्री में मदद मिली। इस अनुभव ने दिखाया कि ग्रामीण हस्तकला के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; उत्पादों की मार्केटिंग, ग्राहकों तक पहुंच, गुणवत्ता और बिक्री की नियमित व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
स्थानीय महिलाओं के लिए इस मॉडल का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इससे वे अपने घर और गांव में रहते हुए काम कर सकती हैं। पहाड़ी इलाकों में हर महिला के लिए नौकरी करने के उद्देश्य से दूसरे शहर जाना संभव नहीं होता। परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों की देखभाल, दूरी और परिवहन जैसी परिस्थितियां बाहर जाकर काम करने के अवसर सीमित कर सकती हैं। घर या गांव के आसपास बुनाई, सिलाई और अन्य कारीगरी से जुड़े काम मिलने पर महिलाएं अपनी सुविधा के अनुसार समय निकालकर आय अर्जित कर सकती हैं। इससे परिवार की आमदनी में योगदान देने के साथ-साथ उनके पारंपरिक कौशल को भी आर्थिक महत्व मिलता है।
विलेज स्क्वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, पहाड़न्स गिल्ड से लगभग 254 स्थानीय कारीगर बुनाई और अन्य हस्तकला संबंधी कामों के लिए जुड़े हुए थे। होमस्टे और पर्यटन गतिविधियों में भी स्थानीय लोगों को काम मिला है। रिपोर्ट में बताया गया कि स्वेटर बुनने वाली महिलाओं की मासिक कमाई लगभग पांच से छह हजार रुपये, बुनकरों की छह से सात हजार रुपये और सिलाई से जुड़े कुछ काम करने वालों की कमाई 20 हजार रुपये तक हो सकती है। वास्तविक आय काम की मात्रा, उत्पादों की मांग और जिम्मेदारियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कारीगरों को बेहतर कौशल सिखाने के लिए फैशन और गारमेंट तकनीक से जुड़े संस्थानों के स्वयंसेवकों की मदद लेने की बात भी सामने आई है।
इस पहल का असर केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। ग्रामीण पर्यटन के लिए कॉटेज का संचालन, मेहमानों की देखभाल, स्थानीय भ्रमण, सांस्कृतिक गतिविधियों और दूसरे सहायक कामों में भी लोगों की भागीदारी की जरूरत होती है। इसके अलावा हस्तनिर्मित उत्पादों के लिए कच्चा माल जुटाने, तैयार कपड़ों को पैक करने, उनकी तस्वीरें बनाने, ऑनलाइन ऑर्डर संभालने और ग्राहकों तक पहुंचाने जैसे काम भी किए जाते हैं। जब एक ग्रामीण उद्यम इन गतिविधियों को व्यवस्थित करता है, तो उससे जुड़े कई परिवारों को आय का अवसर मिल सकता है। इसी व्यापक ग्रामीण रोजगार के संदर्भ में प्रवीण और एकता की पहल को देखा जा रहा है।
इस उद्यम की कहानी में सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि स्थानीय संस्कृति को केवल पर्यटन के लिए दिखाए जाने वाले आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के आधार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई है। पहाड़ी लोकनृत्य, बुजुर्गों की कहानियां, पारंपरिक वस्त्र और गांवों की जीवनशैली इस पहल की पहचान का हिस्सा हैं। इन गतिविधियों के जरिए पर्यटकों को एक अलग अनुभव मिलता है, जबकि स्थानीय समुदाय को अपनी परंपराओं और कौशल के लिए नए अवसर मिलते हैं। इस तरह पर्यटन, हस्तकला और डिजिटल मार्केटिंग को जोड़कर एक ऐसा मॉडल तैयार करने की कोशिश की गई है, जिसमें गांव की पहचान और आजीविका एक-दूसरे को मजबूत कर सकें।
हालांकि, गांव में उद्यम चलाना आसान नहीं है। पहाड़ी क्षेत्र में सड़क, मौसम और बाजार तक पहुंच जैसी समस्याएं रोजमर्रा के काम को प्रभावित कर सकती हैं। प्रवीण ने बताया कि छोटे बच्चे के साथ ग्रामीण इलाके में रहना और बाजार से रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लाना भी कई बार चुनौती बन जाता है। पिछले साल आई अचानक बाढ़ के कारण लगभग चार महीने तक पर्यटकों की आवाजाही प्रभावित रही। ऐसे समय में पर्यटन से जुड़ी आमदनी पर असर पड़ सकता है और कारोबार को संभालना कठिन हो जाता है। इसके बावजूद टीम ने स्थानीय समुदाय के साथ काम जारी रखने का प्रयास किया।
ग्रामीण उद्यमों के लिए ऐसी परिस्थितियां यह भी बताती हैं कि रोजगार पैदा करने के साथ-साथ कारोबार को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना जरूरी है। पर्यटन पर निर्भर व्यवसाय मौसम, प्राकृतिक आपदा और यात्रा की परिस्थितियों से प्रभावित हो सकते हैं। यदि किसी उद्यम की आय केवल पर्यटकों की संख्या पर निर्भर रहे, तो खराब मौसम या सड़क संपर्क टूटने की स्थिति में परेशानी बढ़ सकती है। हस्तनिर्मित उत्पादों की बिक्री और ऑनलाइन बाजार से जुड़ाव इस तरह के कारोबार को आय के दूसरे स्रोत उपलब्ध करा सकते हैं। प्रवीण और उनकी टीम की पहल में पर्यटन तथा परिधानों को साथ विकसित करने की कोशिश इसी लिहाज से महत्वपूर्ण है।
इस परियोजना में निवेश भी एक बड़ा पहलू रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रवीण और उनके पति ने अपनी बचत से इस उद्यम में करीब 3.6 करोड़ रुपये लगाए। उन्होंने बताया कि शुरुआत के दौरान कारोबार से वेतन नहीं लिया और बाद के छह महीनों में उद्यम को मुनाफा होने लगा था। यह जानकारी बताती है कि ग्रामीण स्तर पर एक नया व्यवसाय स्थापित करने में समय, पूंजी और धैर्य की जरूरत होती है। हालांकि, किसी भी कारोबार की वित्तीय स्थिति समय के साथ बदल सकती है, इसलिए इस उपलब्धि को उद्यम की रिपोर्ट की गई स्थिति के रूप में देखना चाहिए।
प्रवीण और एकता की पहल ऐसे युवाओं के लिए भी उदाहरण पेश करती है, जो अपने गांवों में रहकर काम करने के अवसर तलाश रहे हैं। अक्सर माना जाता है कि बेहतर रोजगार के लिए बड़े शहरों में जाना जरूरी है। शहरों में अवसर निश्चित रूप से अधिक विविध हो सकते हैं, लेकिन डिजिटल बाजार, स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक सहयोग के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में भी नए उद्यम विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए स्थानीय जरूरतों की समझ, उत्पादों की गुणवत्ता, ग्राहकों का भरोसा और लगातार काम करने की क्षमता महत्वपूर्ण होती है। यह मॉडल हर गांव में उसी रूप में लागू हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसमें से उपयोगी विचार अपनाए जा सकते हैं।
इस पहल की एक और खासियत यह है कि इसमें महिलाओं को केवल रोजगार पाने वाले समूह के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की सक्रिय भागीदार के रूप में आगे लाने का प्रयास किया गया है। महिलाओं का हुनर जब नियमित बाजार से जुड़ता है, तो उनके काम की कीमत तय करने, उत्पादन बढ़ाने और नए डिजाइन सीखने के अवसर बनते हैं। साथ ही, पारंपरिक बुनाई और हस्तकला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है। यदि ऐसे प्रयासों को प्रशिक्षण, बाजार तक बेहतर पहुंच और नियमित ऑर्डर का समर्थन मिलता रहे, तो ग्रामीण महिलाओं की आय और आर्थिक भागीदारी को मजबूत करने की संभावना बढ़ सकती है।
बेंगलुरु से हिमाचल लौटकर शुरू की गई इस यात्रा ने प्रवीण वर्मा और एकता शर्मा को एक ऐसे उद्यम से जोड़ा है, जिसमें कारोबार के साथ सामाजिक उद्देश्य भी शामिल है। ग्रामीण पर्यटन के माध्यम से गांवों की संस्कृति को पहचान देना, स्थानीय महिलाओं के बनाए उत्पादों को ग्राहकों तक पहुंचाना और ग्रामीण क्षेत्र में काम के अवसर विकसित करना इस पहल के प्रमुख हिस्से हैं। 600 से अधिक परिवारों तक रोजगार या आजीविका के अवसर पहुंचने की बात इस कहानी को व्यापक ग्रामीण विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि, रोजगार से जुड़े कुल परिवारों की संख्या और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभार्थियों का विस्तृत आधिकारिक ब्योरा अलग से उपलब्ध होने पर इस प्रभाव का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा।
हिमाचल के पहाड़ों में प्रवीण और एकता की कहानी यह दिखाती है कि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कौशल और आधुनिक डिजिटल माध्यमों को साथ लेकर नए अवसर बनाए जा सकते हैं। बड़े शहरों से गांवों की ओर लौटना अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है, लेकिन स्पष्ट उद्देश्य, स्थानीय लोगों के साथ सहयोग और बाजार की जरूरतों को समझकर काम करने से ग्रामीण उद्यमों को आगे बढ़ने का रास्ता मिल सकता है। यदि ऐसी पहलें आर्थिक रूप से टिकाऊ बनती हैं और स्थानीय समुदाय को नियमित आय देती हैं, तो वे पलायन के दबाव को कम करने और पहाड़ी क्षेत्रों में आजीविका के नए विकल्प विकसित करने में योगदान दे सकती हैं।










