नेपाल में हालिया विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों और अस्थिर पहाड़ों से जुड़े खतरों को फिर उजागर कर दिया है। इसी बीच 2026 में प्रकाशित एक नए सैटेलाइट अध्ययन में सामने आया है कि हाई माउंटेन एशिया में ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 से 2022-24 के बीच 5.5 फीसदी बढ़ा है।
नई दिल्ली: हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ पिघलने से बनने वाली ग्लेशियर झीलों के बढ़ते आकार ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह आंकड़ों और हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्र में कई ग्लेशियर झीलों का विस्तार हुआ है। ऐसी झीलों के आसपास प्राकृतिक बांध अस्थिर होने की स्थिति में अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
2026 में सामने आए एक सैटेलाइट आधारित अध्ययन के मुताबिक, उच्च हिमालयी एशिया में ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 के बाद से लगभग 5.5 फीसदी बढ़ा है। पूर्वी हिमालय में झीलों के क्षेत्रफल में करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर का विस्तार दर्ज किया गया है।
उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियर झीलें
अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया के अलग-अलग हिस्सों में कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई। इनमें कई झीलों के क्षेत्रफल में समय के साथ उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किया गया है। ग्लेशियर झीलें आमतौर पर ग्लेशियर के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने पर बनती हैं। कई मामलों में इन झीलों का पानी बर्फ, चट्टानों या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे जमा रहता है।
यदि ऐसे प्राकृतिक बांध कमजोर होते हैं और अचानक टूटते हैं, तो बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है। इस तरह की घटना को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी बाढ़ से बुनियादी ढांचे, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है।
भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 झीलों का विस्तार
भारतीय हिमालयी नदी घाटियों पर केंद्रित ISRO के आंकड़ों के अनुसार, 676 ग्लेशियर झीलों में 1984 के बाद उल्लेखनीय विस्तार देखा गया। इनमें से 130 झीलें भारत में स्थित हैं। भारत से जुड़ी इन झीलों का नदी बेसिन के आधार पर वितरण भी महत्वपूर्ण है। इनमें 65 झीलें सिंधु बेसिन, 7 गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में स्थित हैं।
आंकड़ों के अनुसार, इन 676 झीलों में से 601 का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक बढ़ चुका है। यह बदलाव हिमालयी पर्यावरण में हो रहे दीर्घकालिक परिवर्तनों और ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
पूर्वी हिमालय में तेजी से बढ़ा झीलों का क्षेत्रफल

2026 के सैटेलाइट अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया के अलग-अलग हिस्सों में ग्लेशियर झीलों के आकार में बदलाव का विश्लेषण किया गया। इस दौरान पूर्वी हिमालय में विशेष रूप से उल्लेखनीय विस्तार सामने आया। वैज्ञानिकों के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां ऊंचे पर्वतीय इलाके, ग्लेशियर और कई महत्वपूर्ण नदी प्रणालियां मौजूद हैं।
ग्लेशियरों में बदलाव का प्रभाव केवल स्थानीय पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे नीचे की ओर रहने वाले समुदायों और जल संसाधनों पर भी असर पड़ सकता है।
भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा
ग्लेशियर झीलों के बढ़ते आकार के साथ हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन का जोखिम भी महत्वपूर्ण है। भारी बारिश, बर्फ पिघलने, चट्टानों के खिसकने और पर्वतीय ढलानों में बदलाव जैसी घटनाएं प्राकृतिक झीलों के आसपास अस्थिरता बढ़ा सकती हैं। ISRO के उपग्रह आधारित आंकड़ों में हिमालयी क्षेत्र में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन दर्ज किए जाने का उल्लेख है। मानसून के दौरान लगातार बारिश होने पर संवेदनशील ढलानों पर खतरा बढ़ सकता है।
जलविद्युत परियोजनाओं की भी निगरानी
ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित जोखिम को देखते हुए ISRO मानसून के दौरान निगरानी भी करता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में 2,024 ग्लेशियल झीलों की निगरानी की जा रही है। सैटेलाइट तकनीक से झीलों के आकार, आसपास के भू-भाग और संभावित बदलावों पर नजर रखना आपदा जोखिम को समझने में मदद करता है। समय रहते संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान होने पर स्थानीय प्रशासन और परियोजना प्रबंधन एजेंसियां तैयारी और चेतावनी व्यवस्था को मजबूत कर सकती हैं।










