Hiranyakashipu ने 36000 साल की तपस्या की, वरदान में मांगा था अद्भुत शक्ति

Hiranyakashipu ने 36000 साल की तपस्या की, वरदान में मांगा था अद्भुत शक्ति

हिरण्यकश्यप की कहानी अहंकार, भक्ति और न्याय की पौराणिक गाथा है। अहंकारी असुर हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से मिले वरदान के कारण अपनी मृत्यु से कोई डर नहीं था, लेकिन भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार में प्रकट होकर उसके अहंकार का विनाश किया। प्रहलाद की भक्ति और होलिका दहन की घटना आज भी नैतिक और धार्मिक शिक्षा का प्रतीक हैं।

Hiranyakashipu Ki Kahani: हिन्दू पुराणों में वर्णित हिरण्यकश्यप एक अहंकारी असुर राजा था, जिसने 36,000 वर्षों की तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया। उसने खुद को सर्वोच्च मानते हुए प्रजा पर अत्याचार किया, लेकिन उसके पुत्र प्रहलाद की भगवान विष्णु भक्ति और भगवान नरसिंह के अवतार ने उसके अहंकार का विनाश कर दिया। यह कथा भारतीय पौराणिक कथाओं में न्याय, भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है।

अहंकारी असुर हिरण्यकश्यप और उसकी तपस्या

हिंदू पुराणों के अनुसार हिरण्यकश्यप, जिसे हिरण्यकशिपु के नाम से भी जाना जाता है, एक अहंकारी असुर राजा था। उसने खुद को भगवान मानने की शुरुआत कर दी थी और प्रजा पर अत्याचार करने लगा। उसकी इस अहंकार की प्रवृत्ति का मुख्य कारण ब्रह्मा जी से मिला वरदान था। कथाओं के मुताबिक, हिरण्यकश्यप ने 36,000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान देने का प्रस्ताव रखा।

हिरण्यकश्यप ने इस अवसर का उपयोग कर ऐसा विचित्र वरदान मांगा जिसे कोई मानव या पशु, दिन या रात, घर के भीतर या बाहर, धरती या आकाश में, किसी अस्त्र या शस्त्र से उसकी मृत्यु न कर सके। इस वरदान ने उसकी अहंकारी प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया। वरदान मिलने के बाद हिरण्यकश्यप ने खुद को भगवान की तरह पूजने का आदेश दिया और प्रजा पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।

प्रहलाद और होलिका

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्‍त था। प्रहलाद ने अपने पिता के अत्याचारों के बावजूद विष्णु भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई यातनाएं दी, लेकिन प्रहलाद का संकल्प अडिग रहा।

कथाओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रहलाद को लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका को वरदान था कि आग उसे जला नहीं सकती, लेकिन प्रहलाद की भक्ति और होलिका की अहंकार-प्रवृत्ति के कारण होलिका स्वयं जल गई और प्रहलाद सुरक्षित बच गया। इसी घटना के स्मरण में आज होलिका दहन का त्योहार मनाया जाता है।

वरदान के कारण बढ़ा अहंकार

हिरण्यकश्यप का अहंकार उसके वरदान के कारण असाधारण रूप से बढ़ गया था। उसने खुद को सर्वोच्च मानते हुए प्रजा को अपने पूजक बनाने का आदेश दिया। इसके चलते तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर उठे। प्रहलाद ने बार-बार अपने पिता को समझाने की कोशिश की, लेकिन हिरण्यकश्यप ने अपनी अहंकारी मानसिकता नहीं छोड़ी।

हिरण्यकश्यप का यह अहंकार यह दर्शाता है कि पौराणिक कथाओं में अहंकार को सबसे बड़ा रोग माना गया है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, अहंकार मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देता है और उसे अपने कर्तव्यों और नैतिकता से दूर कर देता है।

भगवान नरसिंह का अवतार और अहंकार का विनाश

अंत में, भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया। नरसिंह आधा मानव और आधा सिंह रूप में प्रकट हुए, ताकि हिरण्यकश्यप के वरदान को चुनौती दिए बिना उसे मार सकें। उन्होंने हिरण्यकश्यप को राजमहल की दहलीज पर उठाकर अपनी जांघों पर रखा और अपने नाखूनों से उसके सीने को चीर दिया।

  • हिरण्यकश्यप की हत्या न दिन में हुई और न रात में, बल्कि संध्या वेला में।
  • वह घर के भीतर या बाहर नहीं मारा गया, बल्कि दहलीज पर।
  • न तो नरसिंह पूरी तरह मानव थे और न ही पशु, इसलिए यह वरदान का उल्लंघन नहीं हुआ।
  • अस्त्र या शस्त्र का प्रयोग नहीं हुआ।

इस घटना ने दिखाया कि भगवान की भक्ति और धर्म का पालन करने वाले हमेशा विजयी होते हैं। प्रहलाद की भक्ति और अहंकार के विनाश की यह कथा पौराणिक दृष्टि से न्याय, भक्ति और धर्म का प्रतीक बन गई।

धार्मिक और सामाजिक महत्व

हिरण्यकश्यप की कहानी केवल पौराणिक नहीं, बल्कि जीवन की सीख भी देती है। यह बताती है कि अहंकार मनुष्य का विनाश कर सकता है और भक्ति, सच्चाई और धर्म का पालन अंतिम विजय की कुंजी है। होलिका दहन और नरसिंह अवतार के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव मनाए जाते हैं, जो समाज में नैतिक शिक्षा और चेतना का प्रतीक हैं।

होलिका दहन का पर्व हमें यह सिखाता है कि बुराई कभी जीत नहीं सकती। प्रहलाद की भक्ति और साहस का स्मरण हमें कठिन समय में भी सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

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