उत्तराखंड कैडर के चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में न्यायिक सदस्यों के खुद को सुनवाई से अलग करने का सिलसिला एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) की दिल्ली पीठ के न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने संजीव चतुर्वेदी की ओर से दाखिल एक याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। 21 सितंबर 2026 को जारी आदेश में कहा गया कि मामले की कुछ देर सुनवाई के बाद सदस्य ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया। आदेश में इस फैसले की कोई वजह नहीं बताई गई है। ताजा घटनाक्रम के साथ संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में सुनवाई से अलग होने वाले न्यायिक सदस्यों की संख्या 17 बताई जा रही है।
मौजूदा मामला उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें आईएफएस अधिकारियों की अप्रेजल रिपोर्ट यानी मूल्यांकन रिपोर्ट से संबंधित चैनल को लेकर व्यवस्था की गई थी। संजीव चतुर्वेदी ने इस आदेश को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में चुनौती दी है। उनकी याचिका में मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी संदर्भ दिया गया है। ताजा सुनवाई के दौरान CAT दिल्ली पीठ के सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने मामले से अलग होने का निर्णय लिया। उपलब्ध आदेश में यह नहीं बताया गया है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।
रिपोर्ट के मुताबिक, संजीव चतुर्वेदी से संबंधित अलग-अलग मामलों में अब तक दो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाई कोर्ट के चार न्यायाधीश, CAT के नौ सदस्य और जिला न्यायपालिका के दो न्यायाधीश सुनवाई से अलग हो चुके हैं। हालांकि, इस पूरी संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं हो सकी है और यह आंकड़ा संजीव चतुर्वेदी से संबंधित मामलों की कार्यवाही के आधार पर सामने आया है। इसलिए इसे संबंधित रिपोर्टों में दी गई संख्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
पिछले साल भी उत्तराखंड हाई कोर्ट में संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में दो न्यायाधीशों ने खुद को सुनवाई से अलग किया था। सितंबर और अक्टूबर 2025 में जस्टिस आलोक वर्मा और जस्टिस रविंद्र मैठाणी ने CAT के सदस्यों और रजिस्ट्री के खिलाफ दायर एक अवमानना मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। उस मामले में भी संबंधित आदेशों में अलग होने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया था।
इससे पहले फरवरी 2024 में उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस मनोज तिवारी ने संजीव चतुर्वेदी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में सुनवाई से खुद को अलग किया था। यह मामला कैबिनेट की नियुक्ति संबंधी समिति यानी Appointments Committee of the Cabinet से जुड़े दस्तावेजों को मंगाने की मांग से संबंधित था। मई 2023 में जस्टिस राकेश थपलियाल ने भी एक ऐसे मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया था, जिसमें संजीव चतुर्वेदी के AIIMS, नई दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी के कार्यकाल के दौरान की गई भ्रष्टाचार संबंधी जांच से जुड़े दस्तावेजों का मामला था।
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में न्यायिक सदस्यों के अलग होने का सिलसिला काफी पुराना है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में भी वर्ष 2013 और 2016 में दो न्यायाधीशों ने उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग किया था। 2013 में तत्कालीन जस्टिस रंजन गोगोई और 2016 में जस्टिस यूयू ललित ने अलग-अलग मामलों से खुद को अलग किया था। ये मामले हरियाणा में कथित भ्रष्टाचार से जुड़ी जांच की मांग से संबंधित थे।
CAT में भी संजीव चतुर्वेदी से संबंधित अलग-अलग मामलों में कई सदस्यों ने सुनवाई से खुद को अलग किया है। फरवरी 2025 में CAT के सदस्य हरविंदर ओबराय और बी. आनंद ने उनके अप्रेजल रिपोर्ट को डाउनग्रेड किए जाने से संबंधित मामले से खुद को अलग किया था। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, उस आदेश में अलग होने का कारण नहीं बताया गया था और रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया था कि संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों को उनके सामने सूचीबद्ध न किया जाए।
अप्रैल 2025 में नैनिताल की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नेहा कुशवाहा ने भी संजीव चतुर्वेदी की ओर से दाखिल मानहानि मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। उस मामले में उन्होंने दूसरे CAT सदस्य डीएस महरा के साथ पारिवारिक संबंधों का हवाला दिया था। यह उन मामलों में से एक था जिसमें न्यायिक अधिकारी ने अपने अलग होने का कारण आदेश में दर्ज किया था।
संजीव चतुर्वेदी भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं और उनके करियर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े मामलों को उठाने के कारण चर्चा में रहा है। वह AIIMS, नई दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी के रूप में भी काम कर चुके हैं। उनके कार्यकाल से संबंधित कई प्रशासनिक और सेवा मामलों को लेकर बाद में विभिन्न न्यायिक मंचों पर मुकदमे और याचिकाएं चलीं। इन मामलों में उनके सेवा रिकॉर्ड, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति, अप्रेजल रिपोर्ट और उनके द्वारा उठाए गए प्रशासनिक मुद्दे शामिल रहे हैं।
मौजूदा मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 21 सितंबर को जारी CAT आदेश में केवल इतना दर्ज है कि सुनवाई के दौरान सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने मामले से खुद को अलग कर लिया। आदेश में कोई व्यक्तिगत, प्रशासनिक या अन्य कारण दर्ज नहीं किया गया है। इसलिए उनके अलग होने को किसी विशेष कारण या विवाद से जोड़ना फिलहाल उचित नहीं होगा। आगे मामले की सुनवाई किस पीठ के सामने होगी और नई पीठ कब गठित होगी, यह न्यायाधिकरण की अगली प्रक्रिया से स्पष्ट होगा।
17 न्यायिक सदस्यों के अलग होने का आंकड़ा सामने आने के बाद यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से भी चर्चा में है। हालांकि, किसी न्यायाधीश या न्यायिक सदस्य का किसी मामले से अलग होना अपने आप में किसी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं माना जाता। Recusal न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसके पीछे कारण अलग-अलग हो सकते हैं। मौजूदा मामले में ताजा आदेश ने कोई कारण दर्ज नहीं किया है, इसलिए उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर केवल इतना कहा जा सकता है कि राजवीर सिंह वर्मा अब इस याचिका की सुनवाई नहीं करेंगे।
इससे पहले 2025 में 16वें न्यायिक सदस्य के अलग होने के बाद यह संख्या 17 तक पहुंची है। उस समय उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आलोक वर्मा के अलग होने के बाद संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में कुल 16 न्यायिक सदस्यों के अलग होने की बात रिपोर्ट की गई थी। अब CAT दिल्ली पीठ के जस्टिस राजवीर सिंह वर्मा के अलग होने से यह आंकड़ा फिर बढ़ा है।
फिलहाल संजीव चतुर्वेदी की नवंबर 2021 के उत्तराखंड सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर आगे की सुनवाई नई पीठ के समक्ष होगी। नई पीठ के गठन और अगली तारीख से यह स्पष्ट होगा कि मामले की न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है। ताजा आदेश में किसी तरह की अंतिम टिप्पणी या मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं दिया गया है।










