झारखंड की राजधानी रांची स्थित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT) में प्रथम वर्ष के छात्र आदित्य कुमार की मौत के मामले ने गंभीर रूप ले लिया है। घटना के बाद संस्थान में छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी है। विद्यार्थियों ने संस्थान की बुनियादी सुविधाओं, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति को छात्र की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की पड़ताल करने और संस्थान में विद्यार्थियों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता तथा शिकायतों के निवारण की व्यवस्थाओं की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है।
यह घटना ऐसे समय सामने आई, जब संस्थान में मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं चल रही थीं। छात्र की मौत के बाद परिसर में आक्रोश फैल गया और विद्यार्थियों ने प्रबंधन के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्रों की प्रमुख मांग संस्थान के निदेशक प्रो. राजीव श्रीवास्तव को पद से हटाने की है। इसके साथ ही वे बेहतर चिकित्सा सुविधाएं, एंबुलेंस और आपातकालीन सहायता की उपलब्धता तथा परिसर की अन्य समस्याओं का समाधान चाहते हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि उनकी शिकायतों पर समय रहते ठोस कदम उठाए जाने चाहिए थे। हालांकि, छात्र की मौत के लिए किसी विशेष व्यक्ति या संस्थान की जिम्मेदारी तय होना जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से गठित समिति की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी करेंगी। समिति में दिल्ली के मूलचंद अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र नागपाल और उच्च शिक्षा विभाग में उप सचिव हीरा लाल पूनिया को शामिल किया गया है। मंत्रालय ने समिति को 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। समिति घटना से संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच करेगी तथा छात्रों, संस्थान के अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत कर सकती है।
जांच समिति को केवल छात्र की मौत से जुड़ी परिस्थितियों का अध्ययन ही नहीं करना है, बल्कि संस्थान में विद्यार्थियों की देखभाल और सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थाओं की भी समीक्षा करनी है। इसमें जुलाई 2023 में जारी उच्च शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों के भावनात्मक और मानसिक कल्याण से जुड़े दिशा-निर्देशों के अनुपालन की जांच शामिल है। समिति यह देखेगी कि संस्थान में काउंसिलिंग, मेंटरिंग, शिकायत निवारण और मानसिक परेशानी से जूझ रहे विद्यार्थियों को सहायता देने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं।
समिति को संस्थान में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और विद्यार्थियों को मिलने वाले संस्थागत सहयोग का भी आकलन करना है। जांच के दौरान यदि किसी व्यवस्था में कमी सामने आती है, तो उसे दूर करने के लिए सुझाव दिए जा सकते हैं। मंत्रालय का उद्देश्य केवल मौजूदा मामले की पड़ताल करना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जरूरी सुधारों की पहचान करना भी है। शिक्षा मंत्रालय ने संस्थान के सुचारु संचालन के लिए अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था करने की बात भी कही है, ताकि जांच के दौरान विद्यार्थियों की पढ़ाई और हित प्रभावित न हों
इस पूरे मामले में छात्रों का गुस्सा इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि उनका आरोप है कि संस्थान में लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं। प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों ने हॉस्टल की व्यवस्था, कैंटीन के भोजन, सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरों और निगरानी प्रणाली को लेकर शिकायतें उठाई हैं। छात्रों का कहना है कि वे हर साल फीस और अन्य मदों में बड़ी रकम खर्च करते हैं, इसके बावजूद उन्हें जरूरी सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है। इन शिकायतों की वास्तविक स्थिति और समाधान के लिए संस्थान की ओर से उठाए गए कदमों की जांच होना अब महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विद्यार्थियों ने आपातकालीन चिकित्सा सहायता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि परिसर में एंबुलेंस, ऑक्सीजन, बिजली और लिफ्ट जैसी सुविधाओं की उपलब्धता तथा समय पर सहायता मिलने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी। छात्रों का आरोप है कि यदि आदित्य को समय पर जरूरी चिकित्सा सहायता मिल जाती, तो शायद उसकी जान बच सकती थी। यह प्रदर्शनकारियों का आरोप है, जिसकी पुष्टि अभी स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। जांच समिति और पुलिस की पड़ताल से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि घटना के समय क्या परिस्थितियां थीं, सहायता के लिए किस तरह के कदम उठाए गए और कहीं किसी स्तर पर प्रक्रियागत कमी तो नहीं रही।News
पुलिस ने मामले में अप्राकृतिक मौत का केस दर्ज कर जांच शुरू की है। जांच के दौरान छात्र के कमरे और घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों की पड़ताल की जा रही है तथा संबंधित लोगों के बयान लिए जा रहे हैं। शुरुआती रिपोर्टों में परीक्षा के दबाव की आशंका का उल्लेख भी हुआ था, लेकिन इसे मौत का अंतिम कारण नहीं माना जा सकता। छात्र की मौत के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों को स्पष्ट करने के लिए पुलिस की जांच और अन्य उपलब्ध साक्ष
घटना के बाद हॉस्टल परिसर में छात्रों का प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन भी जारी रहा। विद्यार्थी निदेशक के इस्तीफे और अपनी मांगों पर ठोस कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए हैं। संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) ए.के. भट्ट, निदेशक और अन्य अधिकारियों ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से बातचीत करने का प्रयास किया। हालांकि, बातचीत के बावजूद विद्यार्थियों की नाराजगी पूरी तरह दूर नहीं हुई और वे अपनी मांगों पर कायम रहे। छात्रों का कहना है कि केवल आश्वासन देने के बजाय समस्याओं के समाधान के लिए स्पष्ट कदम उठाए जाने चाहिए।
विरोध प्रदर्शन का असर शैक्षणिक गतिविधियों पर भी पड़ा। संस्थान में 8 अक्टूबर से परीक्षाएं शुरू हुई थीं, लेकिन आंदोलन के कारण सोमवार को परीक्षाएं आयोजित नहीं हो सकीं। इससे पढ़ाई और परीक्षा कार्यक्रम को लेकर भी चिंता पैदा हुई है। ऐसे में संस्थान के सामने एक ओर छात्र की मौत से जुड़े सवालों का निष्पक्ष समाधान करने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर पढ़ाई को व्यवस्थित ढंग से जारी रखने की जिम्मेदारी भी है। छात्रों का भरोसा बहाल करने के लिए जरूरी होगा कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और जांच की प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए।
IIIT रांची की स्थापना वर्ष 2016 में केंद्र सरकार, झारखंड सरकार और उद्योग जगत की भागीदारी वाले सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत हुई थी। संस्थान में कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, गणित एवं कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में पढ़ाई होती है। डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी तकनीकी विशेषज्ञताओं से जुड़े कार्यक्रम भी संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियों का हिस्सा हैं। ऐसे संस्थान में देश के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा और बेहतर करियर की उम्मीद लेकर आते हैं। इसलिए पढ़ाई के साथ सुरक्षित हॉस्टल, समय पर चिकित्सा सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अक्सर पढ़ाई, परीक्षाओं, करियर और परिवार से दूर रहने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर, भरोसेमंद मेंटर, प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं होना जरूरी है। विद्यार्थियों को यह भरोसा भी होना चाहिए कि परेशानी की स्थिति में वे बिना किसी झिझक के मदद मांग सकते हैं और उनकी शिकायत पर समय रहते कार्रवाई होगी। केंद्रीय समिति की जांच में इन पहलुओं की समीक्षा होने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि मौजूदा व्यवस्था में किन सुधारों की जरूरत है।
फिलहाल केंद्र सरकार की तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन के बाद विद्यार्थियों और उनके परिवारों की नजरें जांच की प्रक्रिया तथा आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। समिति को 15 दिनों में रिपोर्ट सौंपनी है। दूसरी ओर, छात्र निदेशक के इस्तीफे और बुनियादी सुविधाओं में सुधार की मांग पर प्रदर्शन कर रहे हैं। पुलिस भी मौत के कारणों और परिस्थितियों की जांच कर रही है। अब जांच के निष्कर्ष यह तय करने में अहम होंगे कि संस्थान की व्यवस्थाओं में क्या कमियां थीं और उन्हें दूर करने के लिए किन कदमों की जरूरत है। मामले में अंतिम निष्कर्ष सामने आने तक आरोपों और आशंकाओं को जांच से साबित तथ्यों से अलग रखना जरूरी है।










