अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के हालिया बयान से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नई तल्खी देखने को मिल रही है। एक पॉडकास्ट के दौरान लुटनिक ने व्यापार समझौते में हो रही देरी के लिए सीधे तौर पर भारत को जिम्मेदार ठहराया।
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में एक बार फिर कड़वाहट और अनिश्चितता देखने को मिल रही है। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के हालिया बयान ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बहस को तेज कर दिया है। लुटनिक ने एक पॉडकास्ट में सीधे तौर पर भारत को जिम्मेदार ठहराया कि व्यापार समझौते में देरी हुई, जिससे अमेरिका के व्यापारिक एजेंडे में बाधा आई। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
लुटनिक का आरोप: भारत ने देरी की
हावर्ड लुटनिक ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता लगभग अंतिम चरण में था, लेकिन भारत ‘सी-सॉ’ यानी झूले के गलत पक्ष पर रहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन करना चाहिए था, जिन्हें उन्होंने इस समझौते का ‘अल्टीमेट क्लोजर’ बताया। लुटनिक के अनुसार, नई दिल्ली की हिचकिचाहट और असहजता ही इस महत्वपूर्ण समझौते को अंतिम रूप देने से रोक रही है। उनके बयान से स्पष्ट संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन के साथ काम करते हुए भारत किसी भी तरह की निरंतरता या भविष्यवाणी की उम्मीद नहीं कर सकता।

भारत का रुख: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
भारत ने लुटनिक के आरोपों का सावधानीपूर्ण और तथ्यात्मक जवाब देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के लिए लगातार बातचीत हो रही है और कई बार सौदा अंतिम रूप लेने के बेहद करीब पहुंचा। भारत ने स्पष्ट किया कि किसी भी हाल में वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत की नीति हमेशा स्वतंत्र और संतुलित कूटनीति पर आधारित रही है, और अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं।
लुटनिक ने वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ अमेरिका के व्यापार समझौतों का हवाला देते हुए कहा कि उम्मीद थी कि भारत के साथ डील इन देशों से पहले पूरी हो जाएगी। रिकॉर्ड के अनुसार, अमेरिका ने वियतनाम और फिलीपींस के साथ 2025 के मध्य में समझौते कर लिए थे, जबकि इंडोनेशिया के साथ भी बातचीत अंतिम चरण में है। भारत के मामले में देरी को ट्रंप की व्यक्तिगत नाराजगी से भी जोड़ा जा रहा है।
व्यापार से बाहर कूटनीतिक तनाव
भारत-अमेरिका संबंधों में यह तनाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। ट्रंप के हालिया बयानों में भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने और उच्च टैरिफ नीति पर नाराजगी जताने की बात सामने आई है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार को घेरा, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को अडिग और स्वतंत्र रखने का संदेश दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप की नाराजगी का मुख्य कारण केवल तेल नहीं है, बल्कि भारत द्वारा उन्हें शांति दूत के रूप में श्रेय न देना भी है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान के साथ संघर्ष विराम में भारत ने ट्रंप की मध्यस्थता को अस्वीकार किया था, जिसे भी व्यापार समझौतों में देरी का एक अप्रत्यक्ष कारण माना जा रहा है।












