भारतीय पासपोर्ट रैंकिंग पर सियासत तेज: मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर साधा निशाना, वैश्विक छवि को लेकर उठाए सवाल

भारतीय पासपोर्ट रैंकिंग को लेकर सियासत तेज हो गई है। मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए देश की वैश्विक छवि और विदेश नीति को लेकर सवाल उठाए।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों के कारण भारत की वैश्विक साख प्रभावित हो रही है।

नई दिल्ली: भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक रैंकिंग को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस छिड़ गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पासपोर्ट रैंकिंग में भारत की स्थिति को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि मौजूदा नीतियों के कारण देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रभावित हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि पासपोर्ट सेवाओं की लागत बढ़ने के बावजूद नागरिकों को अपेक्षित गुणवत्ता की सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।

खरगे का यह बयान ऐसे समय आया है जब विभिन्न वैश्विक पासपोर्ट सूचकांकों में भारत की रैंकिंग को लेकर चर्चा हो रही है। हालांकि अलग-अलग संस्थाएं पासपोर्ट की रैंकिंग तय करने के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाती हैं, इसलिए विभिन्न रिपोर्टों में भारत की स्थिति अलग-अलग दिखाई देती है।

पासपोर्ट रैंकिंग को लेकर सरकार पर हमला

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किए गए अपने बयान में मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्ष 2018 के उस बयान का उल्लेख किया, जिसमें भारतीय पासपोर्ट की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा की बात कही गई थी। खरगे ने दावा किया कि मौजूदा वैश्विक रैंकिंग उस दावे के अनुरूप नहीं है और भारत की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर हुई है।

उन्होंने कहा कि उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों के अनुसार भारत की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गई है, जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। उनके अनुसार, यह केवल पासपोर्ट की ताकत का मुद्दा नहीं है, बल्कि देश की वैश्विक छवि और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव से भी जुड़ा विषय है।

पासपोर्ट शुल्क बढ़ाने पर भी उठाए सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार की पासपोर्ट शुल्क नीति पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया गया है, जबकि सेवाओं में उसी अनुपात में सुधार दिखाई नहीं देता। खरगे के अनुसार, सामान्य पासपोर्ट के लिए शुल्क पहले की तुलना में अधिक हो गया है और तत्काल सेवा के लिए भी लोगों को अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ रही है। उनका कहना है कि यदि नागरिक अधिक शुल्क दे रहे हैं तो उन्हें बेहतर और अधिक आधुनिक सेवाएं भी मिलनी चाहिए।

अपने बयान में खरगे ने विदेशी पर्यटकों की संख्या का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या अभी तक कोविड-19 महामारी से पहले के स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार पर्यटन के वास्तविक आंकड़ों को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं दिखा रही है। उनके अनुसार, विदेशी पर्यटकों और प्रवासी भारतीयों (NRI) से जुड़े आंकड़ों को अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

इसके अलावा उन्होंने भारत की आधिकारिक वीजा आवेदन प्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को अधिक आधुनिक, सरल और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि बेहतर वीजा प्रक्रिया भारत की पर्यटन और वैश्विक छवि को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

पासपोर्ट रैंकिंग कैसे तय होती है?

वैश्विक स्तर पर पासपोर्ट रैंकिंग कई संस्थाएं जारी करती हैं और प्रत्येक संस्था की मूल्यांकन पद्धति अलग होती है। कुछ सूचकांक बिना वीजा या वीजा-ऑन-अराइवल सुविधा वाले देशों की संख्या को आधार बनाते हैं, जबकि कुछ आर्थिक अवसर, वैश्विक गतिशीलता, कर व्यवस्था, निवेश संभावनाओं और जीवन गुणवत्ता जैसे अतिरिक्त मानकों को भी शामिल करते हैं।

इसी वजह से एक ही वर्ष में अलग-अलग रिपोर्टों में किसी देश की रैंकिंग अलग दिखाई दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक सूचकांक के आधार पर किसी देश की वैश्विक स्थिति का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता।

भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग को लेकर उठे इस मुद्दे ने एक बार फिर विदेश नीति, वैश्विक संबंधों और प्रशासनिक सेवाओं को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है। विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि केंद्र सरकार लगातार यह कहती रही है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका और वैश्विक प्रभाव पिछले वर्षों में मजबूत हुआ है।

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