राजू एक 10 साल का शरारती और जिज्ञासु लड़का था। गर्मियों की छुट्टियों में वह अपनी नानी के पुराने घर रहने गया था। नानी का घर बहुत बड़ा था और उसमें कई पुराने कमरे थे जहाँ पुरानी चीज़ों का ढेर लगा रहता था। राजू को इन कमरों में जासूसी करना बहुत पसंद था।
कहानी
एक दोपहर, जब सब सो रहे थे, राजू छत पर बने एक पुराने स्टोररूम में घुस गया। वहाँ धूल से भरी किताबों और संदूकों के बीच, उसे एक अजीब सा दिखने वाला चश्मा मिला। उसका फ्रेम मोटा और काले रंग का था, और काँच बहुत पुराने लग रहे थे।
राजू ने सोचा, 'शायद यह नानाजी का पुराना चश्मा होगा।' उसने खेल-खेल में उस चश्मे को अपनी आँखों पर लगा लिया।
पहला अनुभव: मैं कहाँ हूँ? चश्मा पहनते ही राजू को थोड़ी चक्कर सी आई। वह सामने लगे एक बड़े और धूल भरे शीशे के पास गया। जैसे ही उसने शीशे में देखा, उसकी चीख निकल गई, 'अरे! मैं कहाँ गया?'
शीशे में उसे अपना प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था! उसके कपड़े हवा में तैरते हुए दिख रहे थे, लेकिन उसका शरीर, चेहरा, हाथ-पैर सब गायब थे। उसने घबराकर चश्मा उतारा, तो वह शीशे में वापस आ गया। उसने फिर पहना, तो फिर गायब!
राजू समझ गया, यह कोई साधारण चश्मा नहीं, बल्कि 'जादुई गायब होने वाला चश्मा' था।
अदृश्य शरारतें अब राजू के हाथ एक बड़ा खज़ाना लग गया था। उसने सोचा, 'अब तो बहुत मज़ा आएगा!'
रसोई में हमला: सबसे पहले राजू ने चश्मा पहना और दबे पाँव रसोई में गया। नानी ने गरमा-गरम बेसन के लड्डू बनाकर रखे थे। राजू ने अदृश्य होकर दो लड्डू उठा लिए। नानी ने मुड़कर देखा तो थाली में लड्डू कम थे। वे बड़बड़ाईं, 'अरे, अभी तो रखे थे, क्या बिल्ली ले गई?' राजू मुँह दबाकर हँसता रहा।
बहन को डराना: उसकी छोटी बहन पिंकी बगीचे में झूला झूल रही थी। राजू ने अदृश्य होकर झूला धीरे से हिलाना शुरू कर दिया। पिंकी डर गई, 'कौन है? झूला अपने आप कैसे हिल रहा है?' राजू ने फिर एक पेड़ की डाली हिला दी। पिंकी 'भूत-भूत!' चिल्लाती हुई अंदर भाग गई।
पूरा दिन राजू ने ऐसी ही कई शरारतें कीं। कभी किसी की किताब छुपा दी, तो कभी सोते हुए मामाजी की नाक पर पंख फेर दिया। उसे लगा कि यह दुनिया का सबसे मज़ेदार खेल है।
जब मज़ा सज़ा बन गया शाम हो गई थी। घर के सभी लोग आँगन में बैठकर चाय पी रहे थे और बातें कर रहे थे। वे सब दिन भर हुई अजीब घटनाओं (लड्डू गायब होना, झूला हिलना) के बारे में बात करके हँस रहे थे।
राजू चश्मा पहने हुए उनके बीच खड़ा था। वह उनकी बातें सुन रहा था और उनके साथ हँसना चाहता था, उनसे बात करना चाहता था। उसने कुछ बोला, लेकिन किसी ने उसकी आवाज़ नहीं सुनी।
अचानक उसे एहसास हुआ कि वह वहाँ होकर भी वहाँ नहीं है। वह अकेला महसूस करने लगा। उसकी माँ ने कहा, 'राजू कहाँ है? बहुत देर से दिखा नहीं, उसे भी चाय दे देती।'
राजू ने माँ का हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन माँ को लगा शायद कोई हवा का झोंका था। राजू को बहुत दुख हुआ। उसे अपनी शरारतों पर अब मज़ा नहीं आ रहा था। उसे लगा कि अगर वह हमेशा के लिए गायब रह गया, तो कोई उसे प्यार नहीं कर पाएगा।
वापसी राजू चुपचाप वापस स्टोररूम की तरफ भागा। उसने जल्दी से वह जादुई चश्मा उतारा और उसे एक पुराने संदूक में सबसे नीचे दबा दिया, जहाँ से वह उसे दोबारा कभी न मिले।
वह दौड़कर आँगन में वापस आया। माँ ने उसे देखते ही कहा, 'अरे राजू, कहाँ थे तुम? हम सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे।' राजू ने माँ को कसकर गले लगा लिया। उसे महसूस हुआ कि 'दिखाई देना' और सबके साथ रहना कितना ज़रूरी है।
उस रात राजू ने कसम खाई कि वह अब कभी छुपकर शरारत नहीं करेगा। जादुई चश्मा शायद अभी भी उस पुराने संदूक में बंद है, किसी नए शरारती बच्चे का इंतज़ार कर रहा है।
सीख
'दूसरों से छुपकर मज़ाक करने में थोड़ी देर की खुशी मिल सकती है, लेकिन अपनों के साथ मिल-जुलकर रहने और सच बोलने में ही असली खुशी है।'













