दुनिया में माँ के प्यार जैसा कोई दूसरा प्यार नहीं होता। माँ वह हस्ती है जो अपने बच्चों के लिए अपनी खुशियाँ, अपनी जवानी और यहाँ तक कि अपने शरीर का हिस्सा भी त्याग सकती है। यह कहानी एक ऐसे बेटे की है जो अपनी माँ के रूप-रंग से नफरत करता था, लेकिन जब उसे सच्चाई पता चली, तो उसके पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचा था।
कहानी
मेरी माँ की सिर्फ एक आंख थी। मुझे उनसे सख्त नफरत थी। वे मेरे लिए शर्मिंदगी का कारण थीं। परिवार का पेट पालने के लिए वह एक स्कूल में रसोइए (Cook) का काम करती थीं और दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थीं।
मुझे वह दिन आज भी याद है जब मैं प्राथमिक स्कूल (Primary School) में था। एक दिन मेरी माँ मुझसे मिलने स्कूल आ गईं। मुझे जमीन में गड़ जाने जैसा महसूस हुआ। मैंने सोचा, 'ये मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती हैं? सब बच्चे मुझे चिढ़ाएंगे।' मैंने उन्हें गुस्से से घूरा और वहां से भाग गया। अगले दिन स्कूल में वही हुआ जिसका मुझे डर था। मेरे एक सहपाठी ने चिढ़ाते हुए कहा, 'ईह! तेरी माँ की तो सिर्फ एक ही आंख है!'
मैं शर्म से पानी-पानी हो गया। मुझे लगा कि काश मैं जमीन के अंदर समा जाऊँ। मुझे अपनी माँ पर इतना गुस्सा आया कि उस शाम घर जाकर मैंने उनसे कहा, 'अगर तुम मुझे हंसाने का पात्र ही बनाना चाहती हो, तो तुम मर क्यों नहीं जाती?'
माँ ने कुछ नहीं कहा। वह बस चुपचाप मुझे देखती रहीं। मुझे अपनी बात पर जरा भी बुरा नहीं लगा क्योंकि मैं बहुत गुस्से में था। मैं उस घर से और अपनी माँ से दूर जाना चाहता था।
मैंने खूब मेहनत से पढ़ाई की। मुझे विदेश (सिंगापुर) में पढ़ने का मौका मिला। मैंने वहां पढ़ाई की, फिर नौकरी की, शादी की और अपना खुद का घर खरीद लिया। मेरे बच्चे हुए और मैं अपनी जिंदगी में बहुत खुश था। मैं अपनी माँ को और उस पुरानी जिंदगी को पूरी तरह भूल चुका था।
कई साल बीत गए। एक दिन, मेरे घर के दरवाजे पर घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा—मेरी बूढ़ी माँ वहां खड़ी थीं। इतने सालों बाद वह मुझे और अपने पोते-पोतियों को देखने आई थीं।
उन्हें दरवाजे पर खड़ा देखकर मेरे बच्चे डर गए और रोने लगे। उनकी एक आंख देखकर उन्हें डर लगा। मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उन पर चिल्लाया, 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर आने की? और मेरे बच्चों को डराने की? अभी इसी वक्त यहाँ से चली जाओ!'
मेरी माँ ने बहुत धीमी आवाज में कहा, 'ओह, मुझे माफ करना। शायद मैं गलत पते पर आ गई हूँ।' और वे चुपचाप वहां से चली गईं। उन्होंने एक बार भी पलटकर नहीं देखा।
उसके कुछ साल बाद, मेरे पुराने स्कूल से 'रीयूनियन' (पूर्व छात्रों का मिलन समारोह) का एक पत्र आया। मैंने अपनी पत्नी से झूठ बोला कि मैं किसी बिजनेस ट्रिप पर जा रहा हूँ और मैं अपने पुराने शहर चला गया। समारोह के बाद, न जाने क्यों, मेरे कदम उस पुरानी झोपड़ी की तरफ मुड़ गए जहाँ मैं बचपन में रहता था।
वहां पहुँचकर मैंने देखा कि घर वीरान पड़ा है। पड़ोसियों ने बताया कि मेरी माँ का निधन हो चुका है। यह सुनकर मेरी आँखों से एक भी आँसू नहीं गिरा। तभी एक पड़ोसी ने मुझे एक लिफाफा दिया और कहा, 'यह तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए छोड़ा था।'
मैंने वह पत्र खोला। उसमें लिखा था:
'मेरे प्यारे बेटे,
मैं हर समय तुम्हारे बारे में सोचती रहती हूँ। मुझे माफ करना कि मैं तुम्हारे घर आई और तुम्हारे बच्चों को डरा दिया। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि तुम अपनी जिंदगी में इतने सफल हो गए हो। मुझे इस बात का बहुत अफ़सोस है कि मैं तुम्हारे लिए हमेशा शर्मिंदगी का कारण बनी रही।
लेकिन बेटा, एक सच है जो तुम नहीं जानते। जब तुम बहुत छोटे थे, तो एक दुर्घटना में तुम्हारी एक आंख खराब हो गई थी। एक माँ होने के नाते, मैं यह सहन नहीं कर सकती थी कि मेरा बेटा एक आंख के साथ बड़ा हो और दुनिया उसे ताने मारे।
इसलिए... मैंने अपनी एक आंख तुम्हें दे दी थी।
मुझे इस बात का कभी दुख नहीं हुआ। मुझे तो इस बात की तसल्ली थी कि मेरा बेटा मेरी उस आंख से पूरी दुनिया देख रहा है, जिसे मैं नहीं देख सकती थी। तुम्हारी हर सफलता में मेरी वह आंख भी शामिल थी।
तुम्हारी, माँ'
पत्र पढ़ते ही मेरे हाथ कांपने लगे। मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस माँ को मैं जिंदगी भर नफरत करता रहा, जिसे मैं 'काना' और 'बदसूरत' समझता रहा, उसने अपनी रोशनी मुझे देकर खुद अंधेरे में जीवन बिताया था। मैं वहीं जमीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज मेरे पास दुनिया की हर दौलत थी, लेकिन वो माँ नहीं थी जिसके चरणों में मैं माफी मांग सकता।
सीख
हमें कभी भी अपने माता-पिता के त्याग और बलिदान को नहीं भूलना चाहिए। हो सकता है कि आज वे बूढ़े और कमजोर हों, या शायद वे उतने आधुनिक न हों जितने हम हैं, लेकिन उन्होंने हमें बनाने के लिए जो खोया है, उसकी कीमत हम कभी नहीं चुका सकते। माता-पिता का सम्मान करें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।













