अमेरिकी बाजार में जीरो-ड्यूटी की उम्मीद, भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर को मिल सकता है बड़ा फायदा

भारत को अमेरिकी बाजार में जीरो-ड्यूटी टेक्सटाइल एक्सेस मिलने की उम्मीद बढ़ी। मार्च तक समझौता संभव, बांग्लादेश जैसी सुविधा से निर्यात को मिलेगा बड़ा बढ़ावा।

भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को अमेरिकी बाजार में जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलने की संभावना बढ़ी है। वाणिज्य मंत्री के संकेतों से उम्मीद जगी है कि मार्च तक समझौता हो सकता है, जिससे निर्यात और प्रतिस्पर्धा को मजबूती मिलेगी।

World News: भारत के टेक्सटाइल सेक्टर के लिए अमेरिका से एक बड़ी राहत मिलने की संभावना बनती दिख रही है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के हालिया संकेतों के बाद उम्मीद जगी है कि भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल उत्पादों को अमेरिकी बाजार में जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिल सकता है। अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो भारतीय निर्यातकों को वही फायदा मिल सकता है, जो अब तक बांग्लादेश को मिलता रहा है।

यह संकेत ऐसे समय पर आया है, जब ग्लोबल टेक्सटाइल ट्रेड में प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है और भारतीय उद्योग लंबे समय से अमेरिकी बाजार में समान अवसर की मांग कर रहा था।

मार्च तक समझौते की संभावना

उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह ट्रेड व्यवस्था मार्च के अंत तक साइन हो सकती है। नई दिल्ली के वाणिज्य भवन में हुई एक अहम बैठक में वाणिज्य मंत्री ने इंडस्ट्री लीडर्स को इस दिशा में भरोसा दिलाया है।

इस बैठक में टेक्सटाइल, अपैरल और एक्सपोर्ट सेक्टर से जुड़े बड़े कारोबारी शामिल थे। बैठक के दौरान मंत्री ने साफ किया कि भारत अमेरिका के साथ ऐसी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जिससे भारतीय उत्पादों को भी अमेरिकी बाजार में शुल्क मुक्त पहुंच मिल सके।

जीरो-ड्यूटी एक्सेस का अर्थ

जीरो-ड्यूटी एक्सेस का मतलब है कि भारत में बने टेक्सटाइल और अपैरल प्रोडक्ट्स को अमेरिका में बिना किसी आयात शुल्क के बेचा जा सकेगा। अभी भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में टैरिफ का सामना करना पड़ता है, जबकि बांग्लादेश जैसे देशों को विशेष रियायत मिलती रही है।

इंडस्ट्री का मानना है कि यह असमानता लंबे समय से भारतीय निर्यात की राह में बड़ी बाधा रही है। जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलने से भारतीय कंपनियों की लागत घटेगी और प्रतिस्पर्धा की स्थिति मजबूत होगी।

अमेरिकी टैरिफ नियमों की भूमिका

बैठक में मौजूद एक सूत्र के अनुसार, ट्रंप प्रशासन की ओर से जारी शुरुआती टैरिफ गाइडलाइंस में यह साफ किया गया है कि कोई भी देश अगर अमेरिका से आने वाले कच्चे माल का कम से कम 20 फीसदी हिस्सा उपयोग करता है और उसे तैयार उत्पाद में बदल देता है, तो वह तैयार माल अमेरिका को जीरो ड्यूटी पर निर्यात कर सकता है।

इस नियम के तहत यह सुविधा सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। भारत भी इस शर्त को पूरा करने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि सरकार अब इस मॉडल को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

बांग्लादेश से प्रतिस्पर्धा का दबाव

अब तक अमेरिकी बाजार में बांग्लादेश को जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलने से उसे बड़ा मार्केट एडवांटेज मिलता रहा है। भारतीय निर्यातकों को अक्सर यह शिकायत रही है कि गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता के बावजूद वे टैरिफ के कारण पिछड़ जाते हैं।

इंडस्ट्री सूत्रों का कहना है कि अगर भारत को भी ऐसी ही व्यवस्था मिल जाती है, तो बांग्लादेश के मुकाबले बाजार नुकसान की चिंता खत्म हो जाएगी। इससे भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर को बराबरी का मौका मिलेगा।

कॉटन निर्यात को लेकर चिंता

इस संभावित समझौते को लेकर यह आशंका भी जताई जा रही थी कि इससे भारत के बांग्लादेश को होने वाले कॉटन निर्यात पर असर पड़ सकता है। बांग्लादेश अपनी स्पिनिंग मिलों के लिए हर साल करीब 85 लाख गांठ कपास आयात करता है।

बांग्लादेश कपास मुख्य रूप से भारत, ब्राजील और अफ्रीकी देशों से मंगाता है। हाल के वर्षों में अमेरिका से उसका कपास आयात बहुत सीमित रहा है।

बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री की जरूरतें

बांग्लादेश का कॉटन यार्न उत्पादन उसकी विशाल गारमेंट इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से वह बड़ी मात्रा में यार्न और फैब्रिक का आयात करता है। इसके साथ ही बांग्लादेश में मैन-मेड फाइबर का उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है। यह उसकी एक्सपोर्ट आधारित गारमेंट इंडस्ट्री की रीढ़ माना जाता है।

भारत से कपास की सप्लाई

भारत हर साल औसतन करीब 12 लाख गांठ कपास बांग्लादेश को निर्यात करता है। इसके अलावा भारत खुद भी दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादक देशों में शामिल है।

भारत का सालाना कपास उत्पादन लगभग 3.7 करोड़ गांठ के आसपास रहता है। इसके बावजूद घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत को करीब 50 लाख गांठ कपास का आयात भी करना पड़ता है।

सप्लाई डिमांड की स्थिति

इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, मौजूदा उत्पादन स्तर को देखते हुए भारत के पास अतिरिक्त कपास की बहुत ज्यादा उपलब्धता नहीं है। ऐसे में अमेरिका के साथ संभावित समझौते से भारत को नुकसान होने की संभावना कम है।

उल्टा, टेक्सटाइल सेक्टर में निर्यात बढ़ने से देश में कपास की खपत और बढ़ सकती है। इससे सप्लाई और ज्यादा टाइट हो सकती है।

किसानों पर असर की आशंका कम

कपास किसानों को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि इस तरह की ट्रेड व्यवस्था से उन्हें नुकसान तो नहीं होगा। इंडस्ट्री का मानना है कि ऐसा नहीं है। सूत्रों के अनुसार, अगर कपास की उत्पादकता या खेती का रकबा समान गति से नहीं बढ़ा, तो आने वाले समय में भारत को कपास आयात बढ़ाना पड़ सकता है। यानी किसानों के लिए बाजार सिकुड़ने के बजाय और बड़ा हो सकता है।

FTA से निर्यात को बढ़ावा

भारत ने हाल के वर्षों में यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय यूनियन के साथ Free Trade Agreement साइन किए हैं। इन समझौतों से भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल निर्यात को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।

अब अगर अमेरिका के साथ भी ऐसा ही ट्रेड एग्रीमेंट होता है, तो भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर के लिए नए दरवाजे खुल सकते हैं।

मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में विस्तार

जैसे-जैसे ये ट्रेड एग्रीमेंट लागू होंगे, देश में स्पिनिंग, वीविंग और प्रोसेसिंग यूनिट्स की क्षमता बढ़ने की संभावना है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और टेक्सटाइल हब्स को मजबूती मिलेगी। घरेलू खपत बढ़ने के साथ-साथ एक्सपोर्ट ऑर्डर्स में भी उछाल आने की उम्मीद है।

बदलता ग्लोबल ट्रेड माहौल

ग्लोबल ट्रेड का माहौल तेजी से बदल रहा है। अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजार अब सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करना चाहते हैं। भारत इस मौके को भुनाने की स्थिति में है। जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलने से भारत खुद को बांग्लादेश, वियतनाम और अन्य एशियाई देशों के बराबर खड़ा कर सकता है।

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