कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व संकट की आहट: मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच बढ़ी सियासी खींचतान

कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व संकट की आहट तेज हो गई है। मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सियासी खींचतान बढ़ती जा रही है। जानिए ताज़ा

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर अटकलें फिर से तेज हो गई हैं। डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के हालिया बयानों ने ढाई-ढाई साल के कथित सत्ता समझौते की चर्चाओं को और हवा दे दी है।

बेंगलुरु: कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के तीन साल पूरे होने के साथ ही राज्य की राजनीति में एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री पद को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच संभावित सत्ता-साझेदारी को लेकर सियासी हलचल बढ़ती जा रही है। डीके शिवकुमार के हालिया बयान ने इस बहस को और हवा दे दी है, जिससे पार्टी के भीतर अंदरूनी समीकरण फिर से चर्चा में आ गए हैं।

सत्ता-साझेदारी समझौते की चर्चा फिर सुर्खियों में

2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद पार्टी नेतृत्व ने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच कथित रूप से एक अनौपचारिक सत्ता-साझेदारी फॉर्मूला तय किया था। इस समझौते के अनुसार, मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल दोनों नेताओं के बीच विभाजित होने की बात कही जाती रही है। हालांकि, पार्टी की ओर से इस तरह के किसी भी औपचारिक समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई थी।

अब जब सरकार ने अपने तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं, शिवकुमार समर्थकों का मानना है कि समझौते के अनुसार अब नेतृत्व परिवर्तन का समय आ गया है। यह मांग पार्टी के भीतर नई राजनीतिक बहस को जन्म दे रही है।

डीके शिवकुमार का बयान बना चर्चा का केंद्र

चामराजनगर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब डीके शिवकुमार से मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “समय बताएगा।”
उनका यह संक्षिप्त लेकिन प्रतीकात्मक बयान कर्नाटक कांग्रेस में नई अटकलों को जन्म दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान न केवल उनकी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, बल्कि पार्टी नेतृत्व पर भी एक अप्रत्यक्ष दबाव के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, शिवकुमार ने साथ ही यह भी दोहराया कि वे पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता हैं और हाईकमान जो भी निर्णय लेगा, उसका पालन करेंगे। उनके इस संतुलित रुख ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की व्याख्याओं को जन्म दिया है।

सिद्धारमैया खेमे में बढ़ी सतर्कता

डीके शिवकुमार के बयान के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के समर्थकों में सतर्कता बढ़ गई है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होती है, तो राज्य सरकार की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है। सिद्धारमैया गुट का मानना है कि वर्तमान सरकार ने पिछले तीन वर्षों में कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लिए हैं और ऐसे में अचानक नेतृत्व परिवर्तन से प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है और जल्द ही दोनों नेताओं को नई दिल्ली बुलाकर चर्चा किए जाने की संभावना है। पार्टी नेतृत्व का उद्देश्य किसी भी तरह के सार्वजनिक विवाद को रोकते हुए आंतरिक मतभेदों का समाधान निकालना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखना है, क्योंकि दोनों ही नेता राज्य में पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कर्नाटक कांग्रेस में यह चर्चा लंबे समय से चल रही है कि 2023 में सरकार गठन के समय एक अनौपचारिक ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था। हालांकि, इस पर कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। अब सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद यह मुद्दा फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।

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