लातेहार के चंदवा में 16 दिवसीय नवरात्र शुरू, 500 साल पुरानी पोथी से होती है पूजा

लातेहार के चंदवा स्थित नगर भगवती मंदिर में 16 दिवसीय शारदीय पूजन शुरू हुआ। यहां 500 साल पुरानी कैथी पोथी से पूजा होती है और 20 अक्टूबर को समापन होगा।

लातेहार के चंदवा स्थित मां उग्रतारा नगर भगवती मंदिर में 4 अक्टूबर से 16 दिवसीय शारदीय पूजन शुरू हुआ। यहां नौ दिनों के बजाय 16 दिन देवी आराधना होती है। करीब 500 साल पुरानी कैथी पोथी से पूजा का विधान तय होता है।

लातेहार: देश के अधिकांश हिस्सों में शारदीय नवरात्र की पहचान नौ दिनों की देवी आराधना और दशहरा से होती है, लेकिन झारखंड के लातेहार जिले के चंदवा स्थित मां उग्रतारा नगर भगवती मंदिर की परंपरा इससे अलग है। यहां मां भगवती की पूजा नौ नहीं, बल्कि पूरे 16 दिनों तक चलती है। इस वर्ष 4 अक्टूबर को मां अष्टादशभुजा की कलश स्थापना के साथ 16 दिवसीय शारदीय पूजन शुरू हुआ है, जिसका समापन 20 अक्टूबर को दशमी के दिन नीलकंठ दर्शन के साथ होगा।

जिउतिया के पारण के बाद शुरू होती है विशेष पूजा

नगर भगवती मंदिर में शारदीय पूजन की शुरुआत जिउतिया व्रत के पारण के साथ होने की परंपरा है। इस वर्ष 4 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हुआ। 16 दिनों तक चलने वाली इस पूजा में हर दिन का अपना अलग विधान है। इसमें कलश पूजन, महाआरती, विल्वाभिमंत्रण, देवी आमंत्रण, हवन, बलि और विसर्जन जैसे अनुष्ठान निर्धारित परंपरा के अनुसार किए जाते हैं।

मंदिर की यही विशिष्ट पूजा पद्धति इसे क्षेत्र के अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देती है। शारदीय पूजन के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और मां उग्रतारा नगर भगवती के दर्शन करते हैं।

500 साल पुरानी कैथी पोथी से होती है पूजा

नगर भगवती मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यहां सुरक्षित करीब 500 वर्ष पुरानी हस्तलिखित कैथी लिपि की पोथी है। मंदिर में पूजा का विधान आधुनिक धार्मिक पुस्तकों के आधार पर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से सुरक्षित इस प्राचीन पोथी के अनुसार किया जाता है।

मंदिर के सेवायत सह मुंतजिमकार पंडित गोविंद बल्लभ मिश्र के अनुसार इस पोथी में पूजा के मंत्र, विधियां और अलग-अलग अनुष्ठानों का पूरा विधान दर्ज है।
समय के साथ पूजा के तौर-तरीकों में बदलाव आए, लेकिन मंदिर में इस प्राचीन पोथी में दर्ज परंपरा को आज भी आगे बढ़ाया जा रहा है। यही हस्तलिखित पोथी मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

देवी के प्रकट होने की लोकमान्यता

मंदिर के इतिहास को लेकर कई लोकमान्यताएं भी प्रचलित हैं। मान्यता के अनुसार चंदवा-टोरी क्षेत्र के तत्कालीन शासक पीतांबर नाथ शाही को स्वप्न में देवी के दर्शन हुए थे। इसके बाद मनकरी क्षेत्र के जोड़ा तालाब से देवी की प्रतिमाएं मिलने की कथा कही जाती है। इन्हीं घटनाओं को नगर भगवती मंदिर की स्थापना की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार यहां सदियों से शक्ति और तंत्र साधना की परंपरा से जुड़े श्रद्धालु पहुंचते रहे हैं। समय के साथ यह स्थान स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का केंद्र बन गया।

फूल गिरने को माना जाता है मनोकामना पूरी होने का संकेत

नगर भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी कई विशिष्ट मान्यताएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख मां के आसन पर चढ़ाए जाने वाले फूल से जुड़ी मान्यता है।
श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में स्नान और पूजा के बाद मां के आसन पर फूल चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि जब यह फूल आसन से नीचे गिरता है तो इसे मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है।

इसी तरह पान के पत्ते से जुड़ी भी एक विशेष परंपरा है। विजयदशमी के दिन मां के आसन पर पान के पत्ते चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि पान का पत्ता गिरना मातेश्वरी की स्वीकृति या आदेश का संकेत होता है। इसके बाद नवपत्रिका और भगवती विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

4 से 9 अक्टूबर तक कलश पूजन और महाआरती

मंदिर में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 4 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ पूजा शुरू हुई। 5 से 9 अक्टूबर तक प्रतिदिन मां अष्टादशभुजा का कलश पूजन और महाआरती होगी।

इसके बाद 10 अक्टूबर को अमावस्या की शाम मां गौरा के आगमन के बाद विशेष कलश स्थापना की जाएगी। इसके बाद परंपरा के अनुसार बलि का क्रम शुरू होगा। 11 से 15 अक्टूबर तक प्रतिपदा से पंचमी के दौरान प्रतिदिन सभी पहर आरती और मंडप में स्थापित कलश का पूजन किया जाएगा।

16 अक्टूबर को होगा विल्वाभिमंत्रण

16 अक्टूबर को षष्ठी तिथि पर दोपहर 2 बजे विल्वाभिमंत्रण के लिए श्रद्धालु दामोदर गांव के लिए रवाना होंगे। इसके अगले दिन 17 अक्टूबर को सप्तमी पर मातेश्वरी को आमंत्रण दिया जाएगा। शाम को कलश पूजन और महाआरती होगी। इसी दौरान देवी से जुड़े अन्य निर्धारित अनुष्ठान भी परंपरा के अनुसार किए जाएंगे।

17 अक्टूबर को मां गौरा के विसर्जन के बाद देवी को लाने के लिए दामोदर गांव जाने की भी परंपरा है। इसी दिन देवी स्नान, श्रीगणेश-ब्रह्मा कलश स्थापना और देवी पूजन होगा।

अष्टमी और नवमी पर हवन व संधि बलि

18 अक्टूबर को अष्टमी के दिन शाम 4 बजे मंदिर के पश्चिम दिशा में स्थित हवन कुंड में हवन होगा। रात 10:30 बजे कलश पूजा के बाद बलि की परंपरा शुरू होगी।
19 अक्टूबर को नवमी के दिन सुबह 6:47 से 6:53 बजे के बीच संधि बलि की परंपरा निभाई जाएगी। इसके बाद 20 अक्टूबर को दशमी के दिन शारदीय पूजन का अंतिम चरण पूरा होगा।

दशमी को महिष बलि और नीलकंठ दर्शन

20 अक्टूबर को दशमी के दिन सुबह हवन के बाद करीब 8:30 बजे महिष बलि की परंपरा निभाई जाएगी। इसके बाद करीब 9:34 बजे भगवती का भव्य श्रृंगार कर आसन पर पान चढ़ाया जाएगा।

मंदिर की मान्यता के अनुसार पान का पत्ता गिरना मातेश्वरी के आदेश का संकेत माना जाता है। इसके बाद नवपत्रिका और भगवती विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

अंत में नीलकंठ दर्शन और महिष बलि के साथ दशहरा पर्व संपन्न होगा। इस तरह 16 दिनों तक चलने वाली पूजा में प्रत्येक अनुष्ठान अपने निर्धारित समय और पारंपरिक विधान के अनुसार पूरा किया जाता है।

धार्मिक परंपरा के साथ सांस्कृतिक विरासत भी

चंदवा का नगर भगवती मंदिर केवल 16 दिवसीय शारदीय पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिउतिया व्रत के पारण के बाद पूजा शुरू होने की परंपरा, करीब 500 वर्ष पुरानी कैथी लिपि की हस्तलिखित पोथी, अलग-अलग दिनों में होने वाले विशिष्ट अनुष्ठान और मां के आदेश से जुड़ी पान के पत्ते की मान्यता इस मंदिर की विशिष्ट पहचान बनाते हैं।

जहां देश के अधिकांश हिस्सों में नवरात्र नौ दिनों की देवी आराधना से जुड़ा है, वहीं चंदवा में मां उग्रतारा नगर भगवती की पूजा 16 दिनों तक चलती है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

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