हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारे बच्चे हमारी बातें सुनने से ज्यादा, हमारे कामों को देखकर सीखते हैं। जिस तरह हम आज अपने बुजुर्गों के साथ व्यवहार करते हैं, हम अनजाने में अपने बच्चों को सिखा रहे होते हैं कि कल उन्हें हमारे साथ कैसा व्यवहार करना है। यह कहानी इसी 'कर्म के चक्र' के बारे में है।
मुख्य कहानी
एक समय की बात है, एक छोटे से कस्बे में एक परिवार रहता था। उस परिवार में एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति, उसका बेटा, बहू और एक पाँच साल का छोटा पोता साथ-साथ रहते थे।
बूढ़ा दादा बहुत कमजोर हो चुका था। उम्र के कारण उसके हाथ कांपते थे, आँखों से धुंधला दिखाई देता था और चलते समय कदम लड़खड़ाते थे।
जब पूरा परिवार रात का खाना खाने मेज पर बैठता, तो बूढ़े दादाजी के लिए यह बड़ा मुश्किल समय होता था। कांपते हाथों के कारण अक्सर सब्जी मेज पर गिर जाती या सूप कपड़ों पर छलक जाता। कभी-कभी पानी का गिलास या चीनी मिट्टी की प्लेट उनके हाथ से छूटकर टूट जाती थी।
बेटा और बहू इस रोज-रोज की गंदगी और नुकसान से बहुत चिढ़ते थे।
एक दिन बेटे का सब्र टूट गया। वह झुंझलाकर बोला, “अब बस, बहुत हो गया। पिताजी के खाने का अलग इंतजाम करना पड़ेगा। रोज हमारी भूख खराब कर देते हैं और बर्तन भी तोड़ देते हैं।” बहू ने भी उसकी बात से सहमति जताई।
उन्होंने फैसला किया कि अब से बूढ़े पिताजी उनके साथ बड़ी मेज पर नहीं बैठेंगे। उन्होंने कमरे के एक कोने में उनके लिए एक छोटी सी मेज लगा दी। चूंकि उन्होंने कई कांच की प्लेटें तोड़ दी थीं, इसलिए अब उन्हें खाना देने के लिए एक सस्ता सा 'लकड़ी का कटोरा' (Wooden Bowl) दे दिया गया, ताकि वह टूटे नहीं।
अब जब बाकी परिवार मेज पर हंसते-बोलते खाना खा रहा होता, तब बूढ़ा व्यक्ति उस कोने में अकेले, आंसू भरी आँखों से अपने लकड़ी के कटोरे में खाना खाता। कभी-कभी जब वे खाना मांगते, तो बहू उन्हें डांट देती थी।
घर का वह पाँच साल का छोटा पोता यह सब बहुत ध्यान से और चुपचाप देखता रहता था।
कुछ दिनों बाद की बात है। शाम को काम से लौटने पर पिता ने देखा कि उनका छोटा बेटा जमीन पर बैठा है और लकड़ी के कुछ बेकार टुकड़ों के साथ बहुत ध्यान से कुछ बना रहा है।
पिता ने प्यार से उसके पास जाकर पूछा, "बेटा, तुम इतनी लगन से यह क्या बना रहे हो?"
बच्चे ने अपना काम रोककर अपनी मासूम आँखों से पिता की ओर देखा और बहुत सहजता से जवाब दिया, "पापा, मैं आपके और मम्मी के लिए एक लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ। ताकि जब आप दोनों बूढ़े हो जाओगे, तो मैं आपको इसमें खाना दे सकूँ।"
बच्चे की यह मासूम बात माता-पिता के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरी। वे एकदम सन्न रह गए। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें अपनी भयंकर गलती का अहसास हुआ।
उनकी आँखों से आंसू बहने लगे। उन्हें समझ आ गया कि वे अपने बेटे को क्या भयानक शिक्षा दे रहे थे।
उसी रात, बेटे की आँखों में शर्म के आंसू थे। वह कोने में गया, उसने अपने बूढ़े पिता का कांपता हुआ हाथ पकड़ा और उन्हें इज्जत के साथ वापस परिवार की बड़ी खाने की मेज पर ले आया।
उस रात के बाद से, दादाजी ने हमेशा परिवार के साथ ही खाना खाया। अब अगर उनसे खाना गिरता या कुछ टूटता भी था, तो बेटे या बहू के माथे पर शिकन तक नहीं आती थी।
सीख
हमारे बच्चे वही सीखते हैं जो वे हमें करते हुए देखते हैं, न कि वह जो हम उन्हें सिखाते हैं। अगर आप चाहते हैं कि बुढ़ापे में आपकी संतान आपका सम्मान करे, तो आज आपको अपने माता-पिता का सम्मान करना होगा।













