मध्य प्रदेश के मांडू की प्रसिद्ध खुरासानी इमली को GI टैग मिल गया है। इससे इस दुर्लभ फल की पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा, साथ ही स्थानीय आदिवासी समुदायों की आय, पर्यटन और उत्पादों की मार्केटिंग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
Mandu: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगर मांडू की पहचान बन चुकी खुरासानी इमली को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिलने से क्षेत्र को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। यह मान्यता न केवल इस विशेष फल की विशिष्टता को संरक्षित करेगी, बल्कि वर्षों से इसके संरक्षण और संग्रहण से जुड़े आदिवासी समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर भी पैदा करेगी।
600 साल पुरानी विरासत को मिली नई पहचान
मांडू की खुरासानी इमली, जिसे बाओबाब फल के नाम से भी जाना जाता है, अब आधिकारिक रूप से GI टैग प्राप्त उत्पादों की सूची में शामिल हो गई है। माना जाता है कि यह वृक्ष करीब 600 वर्ष पहले अफगान और अरब व्यापारियों के माध्यम से भारत पहुंचा था। समय के साथ यह मांडू की जलवायु और मिट्टी में पूरी तरह रच-बस गया और आज यह क्षेत्र देश में बाओबाब वृक्षों के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्रों में गिना जाता है।
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इस विशेष पहचान के बाद खुरासानी इमली को कानूनी संरक्षण मिलेगा, जिससे इसकी मौलिकता और क्षेत्रीय पहचान सुरक्षित रह सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ने की संभावना है।
आदिवासी समुदायों को मिलेगा आर्थिक लाभ
धार जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार GI टैग मिलने से उन आदिवासी परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा जो पीढ़ियों से इन वृक्षों का संरक्षण करते आए हैं। अब तक स्थानीय लोग सड़क किनारे या छोटे स्तर पर खुरासानी इमली और उससे बने उत्पाद बेचते थे, लेकिन GI टैग के बाद इसकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग को नया आयाम मिलेगा।
बेहतर बाजार उपलब्ध होने से स्थानीय संग्राहकों और किसानों को अपने उत्पादों की अधिक कीमत मिलने की संभावना है। इससे क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
अनूठी बनावट और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध
खुरासानी इमली का वृक्ष अपनी विशालकाय संरचना के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसकी मोटी तने वाली बनावट हजारों लीटर पानी संग्रह करने की क्षमता रखती है और इसकी आयु भी सैकड़ों से हजारों वर्षों तक मानी जाती है। बिना पत्तियों वाली इसकी शाखाएं इसे एक अनोखा स्वरूप प्रदान करती हैं।
इस फल का गूदा विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट और कई महत्वपूर्ण खनिज तत्वों से भरपूर होता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका उपयोग पाचन संबंधी समस्याओं, बुखार, ऊर्जा की कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में किया जाता रहा है। इसके बीज और छाल का भी विभिन्न औषधीय उपयोग बताया जाता है।
स्थानीय उद्योग और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
GI टैग मिलने के बाद खुरासानी इमली से जुड़े उत्पादों जैसे पाउडर, जूस, कैंडी, जैम और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों के उद्योग को बढ़ावा मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय उद्यमियों को नए व्यवसायिक अवसर प्राप्त होंगे।
साथ ही मांडू आने वाले पर्यटकों के लिए यह उत्पाद एक विशेष आकर्षण बन सकता है। इससे पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
जानकारों के अनुसार मांडू क्षेत्र में कभी लगभग एक हजार खुरासानी इमली के वृक्ष मौजूद थे, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या में कमी आई है। ऐसे में GI टैग इस विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मान्यता के बाद नए पौधों के रोपण, वृक्षों के संरक्षण और जागरूकता अभियानों को गति मिलेगी। इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए इस दुर्लभ प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
GI टैग के रूप में मिली यह पहचान मांडू की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान देने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।










