'मन से जाति मिटाओ', जातिवाद खत्म करने की RSS प्रमुख मोहन भागवत की स्पष्ट अपील

'मन से जाति मिटाओ', जातिवाद खत्म करने की RSS प्रमुख मोहन भागवत की स्पष्ट अपील

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जातिवाद पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि समाज को अपने मन से जाति की भावना निकालनी होगी। उन्होंने दावा किया कि ईमानदार प्रयास से 10 से 12 वर्षों में जातिवाद खत्म हो सकता है।

New Delhi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने जातिवाद को लेकर एक बार फिर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा है कि अगर समाज सच में जातिगत भेदभाव से मुक्त होना चाहता है, तो सबसे पहले लोगों को अपने मन से जाति की भावना निकालनी होगी। भागवत का मानना है कि यदि यह काम ईमानदारी से किया जाए, तो अगले 10 से 12 वर्षों में जातिवाद अपने आप समाप्त हो सकता है।

यह बयान उन्होंने आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित एक जन संगोष्ठी कार्यक्रम के दौरान दिया। उनके इस वक्तव्य को समाज सुधार और सामाजिक समरसता की दिशा में एक अहम संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

शताब्दी वर्ष के मौके पर जन संगोष्ठी

आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस जन संगोष्ठी में मोहन भागवत ने आम लोगों से सीधा संवाद किया। मंच पर उनके साथ प्रांत संघचालक अनिल भालेराव भी मौजूद थे। इस दौरान समाज से जुड़े कई सवालों पर चर्चा हुई, जिसमें जातिवाद का मुद्दा सबसे अहम रहा।

भागवत ने कहा कि संघ केवल किसी संगठन का विस्तार नहीं चाहता, बल्कि पूरे समाज को मजबूत और एकजुट बनाना उसका उद्देश्य है। उन्होंने साफ किया कि संघ का काम व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक की यात्रा है।

जाति की शुरुआत और बदलता स्वरूप

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में जाति व्यवस्था के इतिहास पर भी बात की। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में जाति का संबंध व्यक्ति के पेशे और काम से जुड़ा हुआ था। उस समय इसका उद्देश्य समाज में काम के बंटवारे को व्यवस्थित करना था।

लेकिन समय के साथ जाति ने समाज में स्थायी पहचान का रूप ले लिया और यही पहचान आगे चलकर भेदभाव और असमानता का कारण बन गई। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है, तो वह समाज के लिए समस्या बन जाती है।

'जाति को मन से मिटाना होगा'

भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून या नियमों से ज्यादा जरूरी है मानसिक बदलाव। उन्होंने कहा, “अगर हमें जातिगत भेदभाव को खत्म करना है, तो सबसे पहले जाति को अपने मन से मिटाना होगा।”

उनका मानना है कि जब तक लोग खुद को किसी जाति के दायरे में बांधकर देखेंगे, तब तक समाज में समानता संभव नहीं हो पाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर समाज ईमानदारी से इस दिशा में प्रयास करे, तो 10 से 12 साल में जातिवाद खत्म हो सकता है।

क्या है संघ का उद्देश्य

जन संगोष्ठी के दौरान मोहन भागवत ने आरएसएस के उद्देश्य को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि संघ किसी के विरोध में खड़ा संगठन नहीं है और न ही वह किसी से प्रतिस्पर्धा करता है।

उनके शब्दों में, संघ का उद्देश्य भारत और भारतीय समाज को उसके सर्वोत्तम गौरव तक पहुंचाना है। संघ खुद को बड़ा नहीं करना चाहता, बल्कि समाज को बड़ा बनाना चाहता है।

उन्होंने यह भी कहा कि संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण के जरिए राष्ट्र निर्माण का काम करता है। यही वजह है कि संघ का काम जमीन से जुड़ा हुआ है और इसका असर लंबे समय में दिखाई देता है।

सवालों के जवाब में भागवत का साफ संदेश

कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने मोहन भागवत से कई सवाल पूछे। जातिवाद, सामाजिक एकता और संघ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे। इन सवालों के जवाब में भागवत ने कहा कि समाज को जोड़ने का काम केवल भाषणों से नहीं होगा, बल्कि व्यवहार में बदलाव लाना होगा।

उन्होंने कहा कि अगर लोग सच में संघ को समझना चाहते हैं, तो उन्हें संघ की शाखाओं में आकर देखना चाहिए। वहां संघ का वास्तविक काम और सोच दोनों स्पष्ट हो जाते हैं।

सामाजिक समरसता पर जोर

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन यह विविधता तभी ताकत बनती है जब समाज में समरसता हो। जातिवाद इस समरसता को कमजोर करता है। उन्होंने अपील की कि लोग अपने दैनिक जीवन में ऐसे कदम उठाएं, जिससे भेदभाव कम हो। साथ बैठना, साथ खाना, साथ काम करना और एक दूसरे को सम्मान देना ही असली सामाजिक सुधार है।

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