राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के सर संघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि विश्व के कई देश अब भारत की ओर देख रहे हैं ताकि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को रोका जा सके।
नई दिल्ली: Mohan Bhagwat ने कहा है कि दुनिया मान रही है कि सिर्फ India ही पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को खत्म कर सकता है। मोहन भागवत ने विभिन्न देशों की ओर से भारत को दखल देने के लिए कहने का हवाला दिया है, जिनमें United Arab Emirates और Finland सबसे आगे रहे हैं। विश्व के कई देशों ने यह भावना जाहिर की है कि जिस तरह भारत के अमेरिका और इजरायल से अच्छे संबंध हैं और ईरान के साथ भी सदियों पुरानी मित्रता है, उसी में यह क्षमता है कि भारत दोनों पक्षों के बीच दखल देकर जंग पर पानी डाल सकता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में एक कार्यक्रम में इसी नजरिए पर जोर दिया।
भारत को माना जा रहा है संघर्ष समाधान का केंद्र
मोहन भागवत ने बताया कि विश्व के कई देशों ने यह महसूस किया है कि भारत के अमेरिका और इजरायल से अच्छे संबंध हैं, और ईरान के साथ सदियों पुरानी मित्रता है। यही कारण है कि कई देशों ने भारत से आग्रह किया है कि वह युद्ध प्रभावित देशों के बीच मध्यस्थता करके संघर्ष समाप्त कर सके। उन्होंने विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और फिनलैंड का नाम लिया, जिन्होंने भारत से इस भूमिका की उम्मीद जताई।
भागवत ने कहा, चले हुए युद्ध में बार-बार देशों से आवाज उठ रही है कि इसको समाप्त भारत ही कर सकता है। क्यों? क्योंकि भारत की इस प्रवृत्ति का ज्ञान उन्हें है। इसलिए ये काम होना है। पहले हमें तैयार होना पड़ेगा।
विश्व को चाहिए सद्भाव, संघर्ष नहीं

नागपुर में विश्व हिंदू परिषद के विदर्भ प्रांत कार्यालय के शिलान्यास समारोह के बाद संबोधन में मोहन भागवत ने वैश्विक संघर्ष और समाधान पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि, युद्ध स्वार्थी हितों का परिणाम है। दुनिया को सद्भाव चाहिए, संघर्ष नहीं। भागवत के अनुसार, भारत की भूमिका विश्व संतुलन बनाए रखने और संघर्ष समाप्त करने में निर्णायक हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा एकता, अनुशासन और धर्म के पालन के जरिए स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विश्व धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और श्रेष्ठता-हीनता के विचारों से जूझ रहा है। ऐसे में भारत का परंपरागत दर्शन, जो एकता और परस्पर संबद्धता पर आधारित है, दूसरों के लिए मार्गदर्शक बन सकता है। भागवत ने बताया कि 2,000 वर्षों से दुनिया ने संघर्षों का समाधान खोजने की कोशिश की, लेकिन स्थायी शांति केवल सत्ता संघर्ष से नहीं, बल्कि मानवता, अनुशासन और धार्मिक आचार से ही संभव है।
उन्होंने आगे कहा, धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे दैनिक व्यवहार में प्रदर्शित किया जाना चाहिए। यही हमारी ताकत और दुनिया के लिए संदेश है। मोहन भागवत ने जोर दिया कि भारत की सोच का केंद्र मानवता का पालन और एकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में हालात अस्थिर हैं और देश-विदेश के नेता इस बात को समझते हैं कि केवल भारत सद्भाव और सामूहिक समझ के जरिए संघर्ष को समाप्त कर सकता है।









