सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल, तमिलनाडु और बिहार में SIR यानी मतदाता सूची के स्पेशल रिवीजन पर सवाल उठाए। याचिकाकर्ताओं ने जल्दबाजी की चिंता जताई, जबकि चुनाव आयोग ने इसे कानूनी और पारदर्शी बताया।
New Delhi: बंगाल और तमिलनाडु में चल रहे मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर सवाल उठे हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे इस प्रक्रिया को लेकर इतना आशंकित क्यों हैं। SIR प्रक्रिया को लेकर कई राजनीतिक दल और संगठन सवाल उठा रहे हैं। डीएमके के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि इस बार मतदाता सूची को रिवाइज करने की प्रक्रिया बहुत जल्दबाजी में की जा रही है, जबकि सामान्य स्थिति में इस काम में तीन साल का समय लगता है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और इसके जवाब मांगे हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता जवाब से संतुष्ट हो जाते हैं तो एक्सरसाइज को रद्द किया जा सकता है। यह प्रक्रिया बंगाल, तमिलनाडु और बिहार में राजनीतिक और न्यायिक चर्चा का केंद्र बनी हुई है।
SIR क्या है और क्यों हुआ विवादित
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है। इसमें नए मतदाताओं को जोड़ा जाता है और जिनका नाम सूची में नहीं होना चाहिए उन्हें हटाया जाता है। इसका उद्देश्य सुनिश्चित करना है कि चुनाव के समय सूची सटीक और अप-टू-डेट हो।
हालांकि, राजनीतिक दलों और कुछ नागरिक संगठनों का कहना है कि इस बार की प्रक्रिया में जल्दबाजी दिखाई दे रही है। उनका तर्क है कि इतनी जल्दी अपडेट करने से लाखों मतदाताओं के अधिकारों पर असर पड़ सकता है। डीएमके के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक महीने में पूरी करने का प्रयास है, जबकि सामान्य रिवीजन में तीन साल का समय लगता था।
बंगाल और तमिलनाडु में कौन-कौन दायर कर रहा याचिका
तमिलनाडु में चल रहे SIR के खिलाफ द्रमुक मुनेत्र काषगम (DMK), सीपीआईएम और कांग्रेस ने याचिकाएं दायर की हैं। बंगाल में कांग्रेस ने इस प्रक्रिया के खिलाफ याचिका दायर की है। इन याचिकाओं में आरोप है कि प्रक्रिया इतनी जल्दी और बिना उचित तैयारी के की जा रही है कि लाखों मतदाताओं का नाम सूची से हट सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे प्रक्रिया को लेकर इतना असंतुष्ट क्यों हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर याचिकाकर्ता संतुष्ट होते हैं तो एक्सरसाइज को रद्द किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (11 नवंबर, 2025) को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने छह याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान डीएमके के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह प्रक्रिया बहुत जल्दबाजी में की जा रही है और इसके चलते लाखों लोग मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपना काउंटर दाखिल कर दिया है और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने साफ किया कि सभी रिट याचिकाओं पर नोटिस जारी किया गया है। यह सुनवाई बंगाल और तमिलनाडु के साथ-साथ बिहार में चल रहे SIR मामले से भी जुड़ी हुई है।
बिहार में SIR का इतिहास
SIR प्रक्रिया की शुरुआत सबसे पहले बिहार से जून महीने में हुई थी। बिहार में इसे लेकर कई संगठन और नागरिक समूहों ने याचिकाएं दायर कीं, जैसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स (ADR) और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन वूमेन।
बिहार में प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है। याचिकाकर्ता आरोप लगा रहे हैं कि SIR प्रक्रिया में जल्दबाजी से कई मतदाताओं का नाम सूची से हट सकता है और यह लोकतंत्र के मूलभूत अधिकारों पर असर डालता है।
चुनाव आयोग का रुख
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया जा रहा है और यह लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। आयोग ने कहा कि यह एक्सरसाइज पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी दायरे में की जा रही है।
चुनाव आयोग का तर्क है कि प्रक्रिया को जल्दी पूरा करने का उद्देश्य आगामी चुनाव में मतदाता सूची की सटीकता सुनिश्चित करना है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि SIR पूरी तरह कानूनी है और इसमें किसी भी मतदाता के अधिकारों के नुकसान की आशंका नहीं है।











