NCERT चैप्टर विवाद में तीन शिक्षाविदों को मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने पुराना आदेश लिया वापस

NCERT चैप्टर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन शिक्षाविदों को राहत दी है और अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है। यह मामला शैक्षणिक सामग्री और

Supreme Court of India ने National Council of Educational Research and Training की कक्षा 8 की विवादित न्यायपालिका चैप्टर से जुड़े मामले में अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है।

नई दिल्ली: India Education Law News: सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की कक्षा 8 की न्यायपालिका से जुड़े विवादित चैप्टर मामले में अपना पूर्व आदेश वापस ले लिया है। अदालत ने तीन शिक्षाविदों पर लगाए गए प्रतिबंधों को भी हटा दिया है, जिससे उन्हें सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में अकादमिक कार्यों से दूर रखने का निर्देश अब लागू नहीं रहेगा।

यह मामला राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training) की पाठ्य सामग्री में शामिल एक अध्याय से जुड़ा है, जिस पर न्यायपालिका की प्रस्तुति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट का नया रुख: पुराना आदेश वापस लिया गया

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने सुनवाई के बाद यह स्पष्ट किया कि, 11 मार्च 2026 का पुराना आदेश वापस लिया जाता है. शिक्षाविदों पर लगाए गए प्रतिबंध समाप्त किए जाते हैं. सरकारी या सार्वजनिक संस्थानों में उनके अकादमिक योगदान पर रोक नहीं होगी। इस फैसले से प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार को राहत मिली है।

यह विवाद NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान सामग्री में शामिल न्यायपालिका से संबंधित एक अध्याय को लेकर था। आरोप लगाया गया था कि, अध्याय में न्यायपालिका की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की गई. कुछ तथ्यों को संतुलित तरीके से नहीं दिखाया गया. छात्रों के सामने प्रणाली की एकतरफा तस्वीर रखी गई. सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में यह भी टिप्पणी की थी कि सामग्री में तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है, लेकिन अब वह टिप्पणी भी हटा ली गई है।

कोर्ट की नई टिप्पणी: कोई दुर्भावना नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि, अध्याय तैयार करने में किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं थी. यह सामग्री व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रक्रिया के तहत तैयार की गई थी. शैक्षणिक सामग्री में जानबूझकर गलत प्रस्तुति का इरादा साबित नहीं हुआ.. इस आधार पर अदालत ने अपने पहले के सख्त रुख में संशोधन किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत में दलील दी कि, मार्च 2026 का आदेश शिक्षाविदों को सुने बिना पारित किया गया था. सामग्री किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि सामूहिक प्रयास का परिणाम थी. अकादमिक स्वतंत्रता को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि न्यायपालिका से जुड़े विषयों को छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल करना उन्हें वास्तविक समझ देने के लिए जरूरी है, न कि किसी संस्था की आलोचना के लिए।

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