मुजफ्फरपुर: भारत से सटे नेपाल में चर्च नेटवर्क और मिशनरी गतिविधियों के विस्तार को लेकर बहस तेज हो गई है। जनकपुरधाम जैसे हिंदू धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्र तक चर्च गतिविधियों के पहुंचने का दावा सामने आया है। इस मुद्दे को लेकर नेपाल में धार्मिक पहचान, धर्मांतरण और देश को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग पर भी चर्चा बढ़ रही है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में 2001 से 2021 के बीच ईसाई आबादी के आंकड़ों में लगातार वृद्धि दर्ज हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में वर्तमान में 7,750 से अधिक पंजीकृत चर्च संचालित होने की बात कही गई है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में घरेलू चर्च और प्रार्थना सभाओं के सक्रिय होने का भी दावा किया गया है। कुछ गैर-सरकारी आकलनों में घरेलू चर्चों की संख्या 20 हजार से अधिक बताई गई है। हालांकि इन आंकड़ों और गतिविधियों के स्वतंत्र सत्यापन के लिए आधिकारिक विस्तृत सूची उपलब्ध होना जरूरी है।
इस पूरे मुद्दे में सबसे ज्यादा चर्चा जनकपुरधाम को लेकर है। जनकपुरधाम भगवान राम और माता सीता से जुड़ी धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है और भारत-नेपाल के बीच धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों में इसका विशेष महत्व है। ऐसे क्षेत्र में चर्चों की मौजूदगी और मिशनरी गतिविधियों को लेकर नेपाल के कुछ राजनीतिक और सामाजिक समूह सवाल उठा रहे हैं।
रिपोर्ट में नेपाल के कुछ नेताओं और सामाजिक विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि तराई क्षेत्र से लेकर पहाड़ी इलाकों तक चर्च नेटवर्क के विस्तार को लेकर चिंता जताई जा रही है। कुछ लोगों का आरोप है कि मिशनरी गतिविधियों का प्रभाव दलित, जनजातीय और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में ज्यादा बढ़ा है। हालांकि किसी समुदाय को लेकर ऐसे आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र जांच और विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होगी।
नेपाल की धार्मिक स्थिति पिछले कुछ दशकों में काफी बदली है। 1990 तक नेपाल की पहचान हिंदू राष्ट्र के रूप में थी। इसके बाद राजनीतिक बदलावों के साथ देश में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की दिशा मजबूत हुई और 2006-07 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद नेपाल औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना। इसी बदलाव के बाद धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा बढ़ा और अलग-अलग धार्मिक समुदायों की गतिविधियां सार्वजनिक रूप से अधिक दिखाई देने लगीं।
ईसाई आबादी के आंकड़े भी इसी बदलाव की चर्चा का महत्वपूर्ण आधार बने हैं। रिपोर्ट में नेपाल की राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2001 में ईसाई आबादी 1,04,180, यानी कुल आबादी का करीब 0.45 प्रतिशत थी। 2011 में यह हिस्सेदारी बढ़कर 1.41 प्रतिशत हुई और 2021 की जनगणना में ईसाई आबादी 5,12,313, यानी करीब 1.76 प्रतिशत दर्ज की गई।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि नेपाल में ईसाई आबादी की संख्या और कुल आबादी में उसकी हिस्सेदारी दोनों बढ़ी हैं। हालांकि आबादी बढ़ने के पीछे केवल मिशनरी गतिविधियों को कारण मानना उचित नहीं होगा। धर्म परिवर्तन, धार्मिक पहचान में बदलाव, जनसंख्या वृद्धि और जनगणना में स्वयं की धार्मिक पहचान दर्ज कराने जैसे कई कारण इसके पीछे हो सकते हैं।
नेपाल में चर्च नेटवर्क के विस्तार का मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि देश में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग करने वाले राजनीतिक और सामाजिक समूह पहले से सक्रिय हैं। इन समूहों का तर्क है कि नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान हिंदू परंपरा से जुड़ी रही है और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के बाद धार्मिक बदलावों को लेकर नई चुनौतियां पैदा हुई हैं।
दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के समर्थक धार्मिक स्वतंत्रता को नेपाल के संवैधानिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। इसलिए चर्च या किसी अन्य धार्मिक समुदाय की गतिविधियों पर चर्चा करते समय धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के दायरे को ध्यान में रखना जरूरी है।
नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा के कारण दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही सदियों से होती रही है। बिहार के सीमावर्ती जिलों, खासकर मधुबनी, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण और अन्य क्षेत्रों के लोगों का नेपाल के तराई इलाकों से सामाजिक, पारिवारिक और व्यापारिक संपर्क रहा है। जनकपुरधाम का बिहार से धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी काफी पुराना है।
ऐसे में नेपाल में धार्मिक गतिविधियों में होने वाले बदलावों पर बिहार के सीमावर्ती इलाकों में भी नजर रहती है। भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर धार्मिक यात्राएं, व्यापार और सामाजिक संपर्क सामान्य गतिविधियां हैं। जनकपुरधाम में होने वाले धार्मिक आयोजनों में बिहार और उत्तर प्रदेश के श्रद्धालुओं की भी भागीदारी रहती है।
चर्च नेटवर्क को लेकर सामने आई रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नेपाल में विदेशी सहयोग से संचालित गैर-सरकारी संगठनों और मिशनरी गतिविधियों का विस्तार धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के बाद अधिक दिखाई देने लगा। हालांकि किसी संगठन की गतिविधि को मिशनरी या धर्मांतरण से जोड़ने के लिए उसके आधिकारिक उद्देश्य, फंडिंग और स्थानीय गतिविधियों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
नेपाल में धर्मांतरण का मुद्दा पहले भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म परिवर्तन से जुड़े कानूनों के बीच संतुलन को लेकर वहां समय-समय पर चर्चा होती रही है। यही वजह है कि चर्चों की बढ़ती संख्या के आंकड़े सामने आने के बाद हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाले समूहों को अपनी राजनीतिक मुहिम के लिए नया मुद्दा मिल रहा है।
जनकपुरधाम में चर्चों की मौजूदगी का उल्लेख इस बहस को और संवेदनशील बनाता है। एक तरफ यह धार्मिक विविधता के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र समर्थक समूह इसे अपनी धार्मिक पहचान के कमजोर होने के संकेत के रूप में पेश कर रहे हैं।
नेपाल की 2021 की जनगणना में ईसाई आबादी 5.12 लाख से अधिक दर्ज होना इस बहस का एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि इतनी आबादी मिशनरी गतिविधियों के कारण धर्मांतरित हुई है। इसके लिए धर्म परिवर्तन की वजह, सामाजिक पृष्ठभूमि और क्षेत्रवार आंकड़ों का अलग अध्ययन जरूरी होगा।
इसी तरह 7,750 से अधिक पंजीकृत चर्चों का आंकड़ा भी रिपोर्ट में दिए गए स्रोतों पर आधारित है। यदि इस संख्या को नीति या प्रशासनिक निर्णयों का आधार बनाया जाना है तो नेपाल सरकार के संबंधित विभागों से इसकी आधिकारिक पुष्टि महत्वपूर्ण होगी।
भारत के लिए भी नेपाल में होने वाले सामाजिक और राजनीतिक बदलाव महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध और बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही के कारण नेपाल में होने वाली गतिविधियों का असर सीमावर्ती भारतीय क्षेत्रों तक महसूस किया जा सकता है। इसी वजह से भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जाती है।
हाल ही में बिहार में आर्थिक अपराध इकाई ने भारत-नेपाल सीमा के लिए अलग बॉर्डर रीजनल इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट बनाने की दिशा में विस्तार की योजना की जानकारी दी थी। इसका उद्देश्य आर्थिक अपराध और सीमा पार वित्तीय गतिविधियों की निगरानी मजबूत करना है।
फिलहाल नेपाल में चर्च नेटवर्क के विस्तार को लेकर दो अलग-अलग नजरिए सामने आ रहे हैं। हिंदू राष्ट्र समर्थक समूह इसे धार्मिक और जनसांख्यिकीय बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जबकि धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के समर्थक इसे धार्मिक स्वतंत्रता के विस्तार से जोड़ते हैं। इस विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी धार्मिक समुदाय के बारे में लगाए गए आरोपों की पुष्टि विश्वसनीय और स्वतंत्र आंकड़ों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
कुल मिलाकर, नेपाल में चर्चों की संख्या और ईसाई आबादी में बढ़ोतरी के आंकड़े सामने आने के बाद धार्मिक पहचान और हिंदू राष्ट्र की बहाली को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हुई है। जनकपुरधाम जैसे हिंदू धार्मिक केंद्र में चर्चों की मौजूदगी इस बहस का खास केंद्र बन गई है। 2001 में 1.04 लाख से बढ़कर 2021 में 5.12 लाख से अधिक हुई ईसाई आबादी के आंकड़े इस बदलाव की तस्वीर जरूर दिखाते हैं, लेकिन इसके कारणों और मिशनरी गतिविधियों की वास्तविक भूमिका को समझने के लिए आधिकारिक और स्वतंत्र अध्ययन जरूरी है












