अमित शाह की निर्णायक रणनीति और ऑपरेशन ग्रीन हंट से देश के रेड कॉरिडोर में फैले नक्सलवाद पर नियंत्रण पाया गया। छत्तीसगढ़, झारखंड और अन्य प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बढ़ी, विकास योजनाएं शुरू हुईं और नक्सली नेटवर्क कमजोर हुआ।
New Delhi: भारत ने दशकों से नक्सलवाद और अलगाववाद जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना किया है। उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया और इसे लाल आतंक या रेड कॉरिडोर के नाम से जाना गया। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की कड़े और निर्णायक नीतियों के चलते यह खतरनाक नेटवर्क लगभग समाप्ति की ओर है। अमित शाह ने न केवल सुरक्षा बलों को खुली छूट दी बल्कि राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करके विकास और सुरक्षा को एक साथ जोड़ा, जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा में अभूतपूर्व मजबूती आई।
अनुच्छेद 370 हटाने से जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास
गृह मंत्री के रूप में अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ पर सीधा प्रहार किया। इससे दशकों से जमे पत्थरबाजी और हिंसा जैसी घटनाएं समाप्त हुईं और वहां विकास की नई राह शुरू हुई। स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ समन्वय ने राज्य में शांति और स्थिरता सुनिश्चित की। यह कदम केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।
रेड कॉरिडोर का समाप्त होना
देश के रेड कॉरिडोर में फैले नक्सलवाद ने छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक सहित कई राज्यों में लोगों की जिंदगी और विकास को प्रभावित किया। लेकिन अमित शाह के नेतृत्व में सटीक खुफिया रणनीति, ऑपरेशन ग्रीन हंट और ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियान नक्सल नेटवर्क को कमजोर करने में सफल रहे। अब 2025 तक अधिकांश प्रभावित राज्य आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किए जा चुके हैं।
छत्तीसगढ़ और बस्तर में विकास की नई सुबह

छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सलवाद का सबसे बड़ा गढ़ था, आज विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर जैसे क्षेत्र, जहां कभी सरकार की पहुंच नहीं थी, अब वहां सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों का निर्माण हो रहा है। बस्तर, जिसे लाल आतंक का दिल माना जाता था, अब उस साये से बाहर निकल चुका है। अमित शाह ने स्पष्ट कहा कि बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्त है और यह केवल बयान नहीं, बल्कि जमीन पर साकार हकीकत है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की कहानी
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में नक्सलवाद ने लंबे समय तक लैंडमाइन धमाके और हिंसा फैलाई थी। पुलिस अधिकारियों की हत्या और नागरिकों की जान को खतरा आम बात बन गई थी। लेकिन गृह मंत्री की रणनीति में ग्रेहाउंड बल की स्थापना, लगातार अभियान और आत्मसमर्पण नीति शामिल रही, जिससे नेटवर्क की कमर टूट गई। 2025 तक शीर्ष नक्सली नेताओं के मारे जाने और आत्मसमर्पण की लहर ने इस आंदोलन को लगभग समाप्त कर दिया।
मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड में सुधार
मध्य प्रदेश में हॉक फोर्स ने निर्णायक भूमिका निभाई और नक्सलियों के ठिकानों को systematically खत्म किया। बिहार और झारखंड, जो कभी सबसे प्रभावित राज्य थे, वहां भी बेहतर पुलिसिंग, विकास योजनाओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते स्थिति में भारी सुधार हुआ। लोगों को सुरक्षा मिली, विकास शुरू हुआ और डर का माहौल समाप्त हुआ।
नक्सलवाद का इतिहास
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे नेताओं ने इसे शुरू किया। शुरू में यह आंदोलन जमींदारों के खिलाफ था, लेकिन जल्द ही यह खतरनाक विचारधारा में बदल गया और युवाओं को आकर्षित किया। यह आंदोलन धीरे-धीरे बिहार, ओडिशा, झारखंड और अन्य राज्यों में फैल गया और लाल गलियारा के रूप में उभरा।







