नवजात शिशुओं में ठंड के लक्षण जल्दी पहचानना बेहद जरूरी है। हाथ-पैर ठंडे होना, सुस्ती, रोने में कमजोरी, तेज सांस या बार-बार छींक और नाक बंद रहना गंभीर संकेत हो सकते हैं। समय पर देखभाल और डॉक्टर की सलाह से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है। माता-पिता को इस मौसम में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।
नवजात शिशु और ठंड का खतरा: दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों में कड़ाके की ठंड बढ़ रही है, जिससे नवजात शिशुओं की सेहत प्रभावित हो सकती है। डॉ. हिमांशु भदानी के अनुसार, शिशु का हाथ-पैर ठंडा होना, सुस्ती, दूध न पीना, तेज सांस या बार-बार छींक जैसी स्थितियां तुरंत चिकित्सकीय ध्यान मांगती हैं। माता-पिता और देखभालकर्ताओं को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए ताकि ठंड से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को रोका जा सके।
ठंड के शुरुआती संकेत पहचानें
डॉ. हिमांशु भदानी बताते हैं कि नवजात शिशु का ठंडा होना सिर्फ हाथ-पैर ठंडे होने तक सीमित नहीं है। शिशु का ज्यादा सुस्त रहना, रोने में कमजोरी, तेज सांस या बार-बार छींक और नाक बंद रहना भी चिंता का संकेत हो सकते हैं। इन संकेतों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। समय पर चिकित्सकीय जाँच और उचित देखभाल से गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।

सर्दियों में नवजात शिशु की देखभाल
शिशु को गर्म कपड़े पहनाएं, लेकिन अधिक कपड़ों से ओवरहीटिंग से बचें। कमरे का तापमान संतुलित रखें और ठंडी हवा से बचाएं। नियमित ब्रेस्ट फीडिंग कराएं, ताकि शिशु की इम्यूनिटी मजबूत रहे। नहलाने के बाद तुरंत सुखाकर गर्म कपड़े पहनाएं। रात में हल्का लेकिन गर्म कंबल रखें और धूप में थोड़ी देर बैठाने से भी फायदा होता है, लेकिन तेज हवा या ठंड से बचाव जरूरी है।
अन्य सावधानियां
शिशु को पंखे और ठंडी हवा से दूर रखें। हाथ-पैर नियमित चेक करें और भीड़भाड़ वाली जगहों पर ले जाने से बचें। किसी भी लक्षण पर खुद इलाज करने की बजाय डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता दें।
नवजात शिशुओं में ठंड के लक्षण जल्दी पहचानना और उचित देखभाल करना बेहद जरूरी है। समय पर ध्यान देने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है। माता-पिता और देखभालकर्ताओं को इस मौसम में सतर्क रहना चाहिए।













