चुनाव आयोग तक विपक्ष का मार्च रोका गया, राहुल-प्रियंका धरने पर बैठे; अखिलेश और अभिषेक हिरासत में

SEO-Friendly Meta Description 19 विपक्षी दलों के चुनाव आयोग मार्च को दिल्ली पुलिस ने रोका। जबकि विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी पारदर्शिता की मांग को लेकर 19 विपक्षी दलों ने दिल्ली में मार्च निकाला। पुलिस ने प्रदर्शन रोका और कई नेताओं को हिरासत में लिया। राहुल-प्रियंका आकाशवाणी परिसर में धरने पर बैठ गए।

नई दिल्ली: नई दिल्ली में मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग को लेकर विपक्षी दलों का प्रदर्शन तेज हो गया। 19 विपक्षी पार्टियों के सांसदों और नेताओं ने नई संसद से चुनाव आयोग तक मार्च निकालने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने रास्ते में बैरिकेड लगाकर मार्च रोक दिया। मार्च रुकने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें बस में बैठाया। दोनों बाद में बस से उतरकर आकाशवाणी परिसर में पहुंच गए और वहीं धरने पर बैठ गए। विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कार्यालय तक जाने की अनुमति देने की मांग की।

आकाशवाणी परिसर से चुनाव आयोग का कार्यालय करीब 270 मीटर की दूरी पर बताया गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनका उद्देश्य चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलकर अपनी मांगें रखना है।

विपक्ष का यह प्रदर्शन पिछले पांच दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सातवां बड़ा विरोध प्रदर्शन बताया जा रहा है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े हालिया फैसलों में पारदर्शिता की कमी है। हालांकि, इन आरोपों को चुनाव आयोग या सरकार की ओर से स्वीकार नहीं किया गया है।

संसद से चुनाव आयोग तक मार्च की कोशिश

विपक्षी सांसदों ने सुबह नई संसद परिसर से चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च शुरू किया। मार्च में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता शामिल हुए।

प्रदर्शनकारियों के आगे बढ़ने पर पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए। विपक्षी नेताओं और पुलिस के बीच रास्ता खोलने को लेकर गतिरोध बना रहा। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ते भी नजर आए।

विपक्षी सांसदों को पुलिस ने अलग-अलग चरणों में रोकने की कोशिश की। इसके बाद राहुल और प्रियंका को हिरासत में लेकर बस में बैठाया गया। दोनों के आकाशवाणी परिसर पहुंचने के बाद वहां धरना शुरू हो गया।

विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे चुनाव आयोग तक पहुंचकर अपनी मांगें सीधे अधिकारियों के सामने रखना चाहते हैं।

राहुल गांधी का 'ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो' पोस्टर चर्चा में

प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी के हाथ में 'ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो' लिखा पोस्टर भी दिखाई दिया। कांग्रेस की ओर से इसे युवा मतदाताओं, खासकर Gen-Z तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश के रूप में पेश किया गया।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में 18 से 29 वर्ष की आयु के मतदाताओं की हिस्सेदारी कुल मतदाता संख्या में करीब 22.78 प्रतिशत थी। इस लिहाज से युवा मतदाता भारतीय चुनावों में एक महत्वपूर्ण समूह हैं।

पोस्टर के जरिए विपक्ष ने चुनावी पारदर्शिता और निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर युवाओं के बीच अपनी चिंताओं को पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग की स्थिति के बीच राजनीतिक विवाद अभी जारी है।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर लगाए आरोप

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि यह आंदोलन युवाओं, महिलाओं, किसानों और गरीबों के अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार सत्ता में बने रहने के लिए लोगों के अधिकारों को प्रभावित कर रही है और चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया जा रहा है।

खड़गे ने चुनावी प्रक्रिया और सत्ता हासिल करने के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहा है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के इन आरोपों को राजनीतिक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर अपने संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारों के तहत फैसले लिए जाते हैं।

अखिलेश यादव ने निष्पक्षता पर उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त निष्पक्ष हैं तो उन्हें विपक्षी दलों की बात सुननी चाहिए। उन्होंने इसे लोकतंत्र से जुड़ा मुद्दा बताया और प्रदर्शनकारियों को रोकने के पुलिस के तरीके पर भी सवाल उठाया।

अखिलेश ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। समाजवादी पार्टी लगातार SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर आपत्ति जताती रही है।

SIR के तहत मतदाता सूची के सत्यापन और संशोधन को लेकर विपक्षी दलों की मुख्य चिंता यह है कि कहीं पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर न हो जाएं। चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची शुद्ध करने की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित न हों।

विपक्ष की पांच प्रमुख मांगें क्या हैं?

विपक्षी गठबंधन ने प्रदर्शन के दौरान चुनाव प्रक्रिया से जुड़े पांच प्रमुख मुद्दे उठाए।

1. मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग

विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। साथ ही मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जांच में पारदर्शिता की मांग रखी।

2. मतदाता सूची में पूरी पारदर्शिता

विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन से जुड़ी पूरी जानकारी बूथ और विधानसभा स्तर पर उपलब्ध कराई जाए। किसी वैध मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सूचना और अपील का अवसर देने की मांग भी की गई है।

3. SIR और मतदाता नाम हटाने पर सवाल

विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटने का खतरा हो सकता है। उन्होंने भविष्य के चुनावों में SIR से पहले की मतदाता सूची को आधार बनाने की मांग की।

4. EVM के बजाय बैलेट पेपर की मांग

विपक्ष ने चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM की जगह फिर से बैलेट पेपर इस्तेमाल करने की मांग दोहराई। इसके अलावा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए पंजीकरण प्रक्रिया सरल बनाने की मांग भी सामने रखी गई।

5. विपक्षी दलों से एकजुट रहने की अपील

विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम अधिकार मतदाताओं का होना चाहिए।

अखिलेश और अभिषेक बनर्जी हिरासत में

मार्च के दौरान समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी सक्रिय भागीदारी की। अखिलेश यादव और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया।

प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी की गई। पुलिस ने बैरिकेडिंग के जरिए मार्च को चुनाव आयोग के कार्यालय तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की।

इस घटनाक्रम ने दिल्ली में विपक्ष और प्रशासन के बीच राजनीतिक टकराव को और बढ़ा दिया है।

जया बच्चन और PDA का मुद्दा भी उठा

प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन PDA से जुड़े पोस्टर के साथ पहुंचीं। PDA का अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समूहों से लिया जाता है। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस सामाजिक गठजोड़ को लगातार प्रमुखता देती रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीती थीं। इसके बाद पार्टी ने अपने सामाजिक आधार को यादव और मुस्लिम मतदाताओं से आगे बढ़ाकर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाताओं तक विस्तारित करने पर जोर दिया है।

हालांकि, मौजूदा प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी विपक्ष की मांगें हैं।

शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष पर साधा निशाना

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष के प्रदर्शन की आलोचना की। उन्होंने इसे जनादेश का अपमान बताते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की चिंता से ज्यादा चुनावी हार की प्रतिक्रिया है।

सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप से साफ है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद आने वाले दिनों में और तीखा हो सकता है।

प्रदर्शन का व्यापक राजनीतिक महत्व

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और SIR, मतदाता सूची तथा EVM को लेकर विपक्ष का विरोध भारतीय चुनाव व्यवस्था पर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है।

विपक्ष जहां अधिक पारदर्शिता और निगरानी की मांग कर रहा है, वहीं सरकार और उसके समर्थक विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखते हैं। ऐसे में आने वाले समय में चुनाव आयोग के फैसले, मतदाता सूची से जुड़े कदम और अदालतों में संभावित कानूनी चुनौती इस विवाद की दिशा तय कर सकते हैं।

आकाशवाणी परिसर में राहुल और प्रियंका गांधी का धरना इस प्रदर्शन को प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनाव आयोग का कार्यालय कुछ ही दूरी पर होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों को वहां तक जाने की अनुमति नहीं मिली। अब देखना होगा कि विपक्ष अपनी मांगों को आगे किस संस्थागत या कानूनी मंच पर ले जाता है।

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