पैडमैन से सुप्रीम कोर्ट तक, Menstrual Health पर सिनेमा ने कैसे बदली सोच

Menstrual Health पर बनी फिल्मों ने समाज की सोच बदली। पैडमैन से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक, जानिए कैसे सिनेमा ने मासिक धर्म को संवैधानिक पहचान दिलाने भूमिका

Menstrual Health पर बनी फिल्मों ने समाज की चुप्पी तोड़ी और सोच बदली। पैडमैन जैसी फिल्मों से शुरू हुई बहस सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक पहुंची, जिसने मासिक धर्म स्वच्छता को सम्मान से जीने के अधिकार से जोड़ दिया।

Bollywood: भारत जैसे समाज में कुछ विषय ऐसे रहे हैं जिन पर बात करना लंबे समय तक वर्जित माना गया। मासिक धर्म यानी Menstrual Health भी उन्हीं विषयों में शामिल रहा है। एक समय ऐसा था जब घर में पीरियड्स का नाम लेना भी असहजता पैदा कर देता था और टीवी पर सैनिटरी पैड का विज्ञापन आते ही लोग चैनल बदल देते थे। लेकिन समय के साथ समाज बदला है और इस बदलाव में सिनेमा की भूमिका बेहद अहम रही है। आज वही विषय बड़े पर्दे से निकलकर अदालतों, नीतियों और राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दी संवैधानिक पहचान

30 जनवरी 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीने के अधिकार का हिस्सा बताया। यह फैसला अचानक नहीं आया। इसके पीछे वर्षों की सामाजिक कोशिशें, जागरूकता अभियान और सबसे अहम सिनेमा द्वारा बनाई गई वह जमीन है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर किया। अदालत के इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि पीरियड्स कोई निजी या शर्म की बात नहीं बल्कि एक मौलिक अधिकार से जुड़ा विषय है।

सिनेमा बना बदलाव का माध्यम

सरकारी योजनाएं और स्वास्थ्य विभाग की पहल अपनी जगह जरूरी थीं, लेकिन जो काम दशकों में नहीं हो सका, वह कई बार दो घंटे की फिल्म ने कर दिखाया। सिनेमा ने Menstrual Health को केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे पूरे समाज की जिम्मेदारी के रूप में पेश किया। खासतौर पर पिछले एक दशक में बनी कुछ फिल्मों ने इस चुप्पी को तोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई।

पैडमैन और एक क्रांतिकारी जोखिम

जब भी मासिक धर्म और सिनेमा की बात होती है, सबसे पहला नाम ‘पैडमैन’ का आता है। साल 2018 में रिलीज हुई यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन से प्रेरित थी, जिन्होंने सस्ते और सुलभ सैनिटरी पैड बनाने की मशीन तैयार की। इस फिल्म को बनाना आसान नहीं था। अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना के लिए यह एक बड़ा जोखिम था क्योंकि उस समय तक बॉलीवुड में कोई भी बड़ा स्टार इस विषय को छूने को तैयार नहीं था।

विरोध और डर के साये में बनी फिल्म

‘पैडमैन’ को लेकर शुरुआती दौर में कई तरह की आशंकाएं थीं। फिल्ममेकर्स को डर था कि क्या सेंसर बोर्ड इसे मंजूरी देगा या इसे A Certificate दे दिया जाएगा। शूटिंग के दौरान कई ग्रामीण इलाकों में इसका विरोध भी हुआ। लोगों को लगता था कि यह महिलाओं का निजी विषय है और इसे सार्वजनिक मंच पर लाना गलत है। लेकिन आर बाल्की का संवेदनशील निर्देशन और फिल्म की ईमानदार सोच ने इन सभी आशंकाओं को पीछे छोड़ दिया।

पैडमैन ने बदली सोच

‘पैडमैन’ ने वह कर दिखाया जो सरकारी पोस्टर और विज्ञापन नहीं कर पाए। इस फिल्म ने पीरियड्स को Drawing Room की बातचीत का हिस्सा बना दिया। अक्षय कुमार का वह संवाद कि अमेरिका के पास सुपरमैन और बैटमैन हैं लेकिन भारत के पास पैडमैन है, सिर्फ एक फिल्मी लाइन नहीं बल्कि एक सामाजिक संदेश बन गया। यही वजह रही कि फिल्म को सराहना मिली और कई राज्यों में इसे टैक्स फ्री भी किया गया।

ग्रामीण भारत की अनदेखी सच्चाई

‘पैडमैन’ से ठीक पहले साल 2017 में आई फिल्म ‘फुल्लू’ ने ग्रामीण भारत की कड़वी सच्चाई दिखाई। शारिब हाशमी अभिनीत इस फिल्म में दिखाया गया कि कैसे आज भी कई गांवों में महिलाएं गंदे कपड़े, राख या रेत का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। अभिषेक सक्सेना द्वारा निर्देशित यह फिल्म यह बताती है कि जानकारी की कमी किस तरह गंभीर बीमारियों को जन्म देती है।

बॉक्स ऑफिस नहीं समाज था मकसद

‘फुल्लू’ भले ही Box Office पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई, लेकिन इसने समाज को आईना दिखाने का काम जरूर किया। फिल्म यह समझाने में सफल रही कि जिसे हम शर्म मानते हैं, वह दरअसल जानलेवा लापरवाही है। इस फिल्म ने यह भी दिखाया कि पुरुष किस तरह अपनी पत्नी के दर्द को समझते हुए भी समाज के डर से चुप रह जाते हैं।

ऑस्कर तक पहुंची भारतीय आवाज

मासिक धर्म से जुड़ी इस सिनेमाई क्रांति को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब हापुड़ के एक गांव की महिलाओं पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’ ने ऑस्कर अवॉर्ड जीता। इस डॉक्यूमेंट्री ने दिखाया कि कैसे महिलाएं सैनिटरी पैड बनाने की मशीन लगाकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनीं बल्कि पीरियड्स से जुड़े कलंक को भी तोड़ दिया।

जब पूरी दुनिया ने भारत को सलाम किया

ऑस्कर के मंच पर जब इस डॉक्यूमेंट्री की निर्देशक रायका जेहताबची ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि पीरियड्स पर बनी फिल्म ने ऑस्कर जीता है, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि भारत में आए बदलाव की वैश्विक स्वीकार्यता थी। इस डॉक्यूमेंट्री में अरुणाचलम मुरुगनाथम खुद नजर आए, जिससे पैडमैन और इस कहानी की कड़ी और मजबूत हो गई।

काली थैली की मानसिकता पर प्रहार

एक समय मेडिकल स्टोर पर सैनिटरी पैड को अखबार में लपेटकर काली थैली में ऐसे दिया जाता था जैसे कोई अपराध हो। टीवी विज्ञापनों ने इस टैबू पर बात शुरू की, लेकिन सिनेमा की संवेदनशीलता ने इसे गहराई दी। शहरी भारत में आज यह मानसिकता काफी हद तक बदल चुकी है और इसमें फिल्मों का बड़ा योगदान है।

2022 में आई आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘डॉक्टर जी’ ने इस विषय को एक नया आयाम दिया। फिल्म ने दिखाया कि एक पुरुष गाइनेकोलॉजिस्ट को महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति कितना संवेदनशील होना चाहिए। यह फिल्म केवल महिलाओं के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी एक सीख थी।

मनोरंजन से आगे सामाजिक जिम्मेदारी

इन फिल्मों को सिर्फ हिट या फ्लॉप के नजरिये से देखना इनके साथ अन्याय होगा। ये फिल्में पुरुषों के लिए संवेदनशीलता की कक्षा की तरह हैं। इनका असर यह हुआ कि अब पुरुष अपनी बहनों, पत्नियों और बेटियों के स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने लगे हैं।

मुरुगनाथम से सुप्रीम कोर्ट तक

अरुणाचलम मुरुगनाथम की छोटी सी मशीन, अक्षय कुमार का पर्दे पर पैड लेकर दौड़ना और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, ये सभी एक ही बदलाव की कड़ियां हैं। बदलाव की शुरुआत हमेशा एक छोटी सी आवाज से होती है और सिनेमा ने उस आवाज को मंच दिया।

Leave a comment