सनातन धर्म में देवी-देवताओं की परिक्रमा घड़ी की दिशा में करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या और नियम भी बताए गए हैं।
Parikrama Rules: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान भगवान की परिक्रमा का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा में करनी चाहिए, जिसे प्रदक्षिणा कहा जाता है। ऐसा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति मिलने की मान्यता है।
घड़ी की दिशा में परिक्रमा करने का क्या है महत्व
सनातन धर्म में मंदिर या देवी-देवताओं की मूर्ति के चारों ओर घूमने की प्रक्रिया को प्रदक्षिणा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा में ही करनी चाहिए। माना जाता है कि इस दिशा में घूमने से शरीर और मन सकारात्मक ऊर्जा को बेहतर तरीके से ग्रहण कर पाते हैं।

धर्म ग्रंथों में भी प्रदक्षिणा को पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। मान्यता है कि उल्टी दिशा में परिक्रमा करने से ऊर्जा का संतुलन प्रभावित होता है और पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। यही वजह है कि मंदिरों में श्रद्धालुओं को हमेशा दाईं ओर से परिक्रमा करने की सलाह दी जाती है।
परिक्रमा करते समय किन नियमों का रखें ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा शांत मन और धीमी गति से करनी चाहिए। इस दौरान किसी प्रकार का विवाद, क्रोध या नकारात्मक सोच से बचना उचित माना गया है। परिक्रमा करते समय हाथ जोड़कर रखना और नंगे पैर चलना शुभ माना जाता है।
इसके अलावा साफ वस्त्र पहनकर और स्नान के बाद ही परिक्रमा करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ की गई प्रदक्षिणा से मानसिक शांति और सकारात्मकता बढ़ती है।
किस देवता की कितनी परिक्रमा करना शुभ माना गया है
धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या भी अलग बताई गई है। भगवान गणेश की तीन परिक्रमा शुभ मानी जाती है, जबकि भगवान विष्णु की चार परिक्रमा करने का विधान है।
माता लक्ष्मी और देवी दुर्गा की एक परिक्रमा करने की मान्यता है। वहीं सूर्य देव की सात और हनुमान जी की तीन परिक्रमा करने को शुभ माना गया है। भगवान शिव की परिक्रमा करते समय जलाधारी को पार नहीं किया जाता और वहीं से वापस लौटने का नियम बताया गया है।








