भगवान परशुराम को विष्णु का छठा अवतार और अष्टचिरंजीवियों में एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वे महेंद्र पर्वत पर तपस्या करते हैं और अमर हैं। परशुराम जयंती पर भक्त पूजा, व्रत और दान करते हैं, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि की कामना की जाती है।
Parshuram Jayanti 2026: वैशाख शुक्ल तृतीया पर मनाई जाने वाली परशुराम जयंती को लेकर धार्मिक मान्यताओं में भगवान परशुराम की अमरता और महेंद्र पर्वत से जुड़ी कथाएं विशेष रूप से चर्चा में हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या करते हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धालु इस अवसर पर पूजा, व्रत और दान कर आध्यात्मिक लाभ की कामना करते हैं।
कौन हैं भगवान परशुराम और क्यों माना जाता है उन्हें अमर
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया भी कहा जाता है, के दिन हुआ था। उन्हें धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए पृथ्वी पर अवतरित माना जाता है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि वे अष्टचिरंजीवियों में शामिल हैं, यानी ऐसे दिव्य पात्र जो कलयुग के अंत तक जीवित रहेंगे। माना जाता है कि वे भविष्य में भगवान कल्कि के गुरु बनकर उन्हें अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान देंगे।

महेंद्र पर्वत से जुड़ा रहस्य और मान्यताएं
शास्त्रों और धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम ने अपना राज्य और सभी भौतिक वस्तुएं त्यागकर महेंद्र पर्वत को तपस्या स्थल बनाया था। यह स्थान आज भी उड़ीसा के गजपति जिले में स्थित महेंद्रगिरि पर्वत के रूप में जाना जाता है।
मान्यता है कि भगवान परशुराम आज भी सूक्ष्म रूप में वहां तपस्या में लीन हैं। भक्तों के बीच यह विश्वास गहराई से जुड़ा हुआ है कि वे समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए अदृश्य रूप से मार्गदर्शन करते हैं।
परशुराम जयंती पर क्या करते हैं श्रद्धालु
परशुराम जयंती के दिन भक्त ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर दिन की शुरुआत करते हैं। पवित्र जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना शुभ माना जाता है, जिससे मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं।
इसके बाद भगवान परशुराम और विष्णु जी की पूजा की जाती है। घी का दीपक जलाकर पुष्प, चंदन और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और जरूरतमंदों को दान भी करते हैं।
पूजा से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं
इस दिन शस्त्र और शास्त्र दोनों का सम्मान करने की परंपरा है। लोग अपने कार्य उपकरणों या पुस्तकों की सफाई कर उन्हें व्यवस्थित रखते हैं, जो ज्ञान और कर्म के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
दान और सेवा को भी इस दिन विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि निस्वार्थ भाव से किया गया दान जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।








