झारखंड के वन्यजीव इतिहास में वर्ष 2025अच्छा साबित हुआ है। पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में इस साल बाघों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि हाथियों की घटती संख्या ने वन्यजीव संरक्षणists और अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है।
Palamu Tiger Reserve: वर्ष 2025 झारखंड के वन्यजीव इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ है। पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में बाघों की संख्या बढ़कर छह हो गई और राज्य ने पहली बार बाघ का सफल रेस्क्यू कर उसे सुरक्षित ठिकाना दिया, जिसे 'सम्राट' नाम दिया गया। हालांकि, हाथियों की घटती संख्या (217) चिंता का विषय बनी हुई है।
इस साल जयगीर और कुजरूम गांवों का सफल विस्थापन कर एक मॉडल गांव भी बसाया गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय शिकार नेटवर्क के खुलासे ने वन्यजीव सुरक्षा पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
बाघ 'सम्राट' का सफल रेस्क्यू
जून 2025 में सिल्ली के एक घर में प्रवेश करने वाले बाघ का 13 घंटे के जटिल ऑपरेशन के बाद सुरक्षित रेस्क्यू किया गया। इसे 'सम्राट' का नाम दिया गया और इसे सुरक्षित रूप से वापस बंगाल ले जाया गया। प्रजेशकांत जेना ने बताया कि इस रेस्क्यू के बाद PTR में बाघों की कुल संख्या 6 हो गई है। यह बढ़ोतरी वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों और रिजर्व में सुरक्षा प्रबंधन की सफलता को दर्शाती है।
इस साल पहली बार झारखंड में मांसाहारी जीवों और गिद्धों की विस्तृत गणना भी की गई। इस पहल का उद्देश्य वन्यजीव प्रजातियों की विविधता और उनकी पारिस्थितिकी स्थिति का सटीक आंकलन करना है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन आंकड़ों से रिजर्व में जैव विविधता और संरक्षण की रणनीतियों को और सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।

हाथियों की घटती संख्या चिंता का विषय
हालांकि बाघों की संख्या में बढ़ोतरी खुशी की बात है, लेकिन हाथियों की घटती संख्या वन्यजीव विभाग के लिए चिंता का विषय बन गई है। अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में हाथियों की संख्या 678 (2017) से घटकर मात्र 217 रह गई है। प्रजेशकांत जेना ने बताया कि हाथियों की गिरती संख्या के कारणों की गहन पड़ताल की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि घटती संख्या के पीछे अवैध शिकार, आवास ह्रास, और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियां जिम्मेदार हो सकती हैं। वन्यजीव विभाग अब इन कारकों पर विशेष ध्यान दे रहा है और हाथियों की सुरक्षा के लिए नए कदम उठाने की योजना बना रहा है।
अन्य वन्यजीवों की स्थिति
PTR में लगभग 60 गौर पाए गए हैं, जिन्हें आनुवंशिक रूप से कमजोर माना जा रहा है। गौर की संख्या में स्थिरता के बावजूद आनुवंशिक कमजोरी संरक्षण के लिए चुनौती प्रस्तुत करती है। वन्यजीव अधिकारियों ने गौर प्रजाति की निगरानी और संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार किए हैं। इस साल, जयगीर और कुजरूम गांवों का सफल विस्थापन कर एक मॉडल गांव बसाया गया।
इससे स्थानीय लोगों और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करने में मदद मिली है। वन विभाग के अनुसार, ऐसे मॉडल गांव वन्यजीव सुरक्षा और स्थानीय विकास का संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।










