Vrinda Shekhawat ने RAS 2024 में 20वीं रैंक हासिल कर परिवार का नाम रोशन किया। मेडिकल शॉप संचालक की बेटी वृंदा ने लगातार मेहनत, अनुशासन और फोकस के दम पर सफलता पाई और पहली अधिकारी बनीं।
जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर के मानसरोवर क्षेत्र की रहने वाली वृंदा शेखावत ने Rajasthan Administrative Service (RAS) 2024 परीक्षा में 20वीं रैंक हासिल कर एक उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की है। वह अपने परिवार की पहली सदस्य हैं, जिन्होंने सरकारी प्रशासनिक सेवा में स्थान बनाया है। उनके पिता एक मेडिकल शॉप चलाते हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं।
वृंदा की सफलता केवल एक परीक्षा में उच्च रैंक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस निरंतर संघर्ष, धैर्य और अनुशासन की कहानी है, जिसने उन्हें एक साधारण छात्रा से प्रशासनिक अधिकारी बनने तक पहुंचाया।
असफलता से सीखकर हासिल की सफलता
वृंदा ने वर्ष 2023 में भी RAS परीक्षा पास की थी, लेकिन उस समय उनकी रैंक लगभग 572 थी। यह परिणाम उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था, जिससे उन्हें निराशा जरूर हुई। हालांकि, उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी कमजोरियों पर काम किया और तैयारी जारी रखी।
2024 में उन्होंने नए दृष्टिकोण और बेहतर रणनीति के साथ परीक्षा दी, जिसका परिणाम उनकी 20वीं रैंक के रूप में सामने आया। यह साबित करता है कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि सुधार और सफलता की दिशा में एक कदम होती है।
“एवरेज स्टूडेंट” से टॉप-20 तक
वृंदा खुद को शुरू से एक औसत छात्रा मानती हैं। उन्होंने दसवीं में 9.2 CGPA और बारहवीं में 84% अंक प्राप्त किए थे। उनका मानना है कि सफलता का सीधा संबंध केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत और अनुशासन से होता है।
उन्होंने अपनी तैयारी के दौरान एक सरल लेकिन प्रभावी नियम अपनाया—रोजाना कम से कम 4 घंटे पढ़ाई। यदि किसी दिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता था, तो वह अगले दिन इसकी भरपाई करती थीं। यही निरंतरता उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार का कारण बनी।
इंटरव्यू में पूछे गए चुनौतीपूर्ण सवाल
वृंदा के अनुसार, इंटरव्यू राउंड भी काफी चुनौतीपूर्ण रहा। उनसे एक प्रश्न पूछा गया कि यदि वे एक SDM (उपखंड अधिकारी) हों, तो किसी संवेदनशील प्रशासनिक मुद्दे (SIR) की आलोचना कैसे करेंगी। इस प्रश्न का उद्देश्य उनकी संतुलित सोच और निर्णय लेने की क्षमता को परखना था।
इसके अलावा उनसे यह भी पूछा गया कि वे अपने माता-पिता से कौन-सी जीवन मूल्यों को प्रशासनिक सेवा में लागू करना चाहेंगी। वृंदा ने इन सवालों का जवाब आत्मविश्वास और संतुलित दृष्टिकोण के साथ दिया।
सोशल मीडिया से दूरी और लक्ष्य पर फोकस
आज के डिजिटल युग में जहां सोशल मीडिया ध्यान भटकाने का एक बड़ा कारण बन सकता है, वहीं वृंदा ने इसका सीमित और नियंत्रित उपयोग किया। उन्होंने तय किया कि कब सोशल मीडिया का उपयोग करना है और कब उससे दूरी बनानी है।
तैयारी के दौरान उन्होंने कई सामाजिक कार्यक्रमों और पारिवारिक आयोजनों को भी छोड़ दिया, ताकि वे अपने लक्ष्य पर पूरी तरह केंद्रित रह सकें। यह त्याग उनकी सफलता की एक महत्वपूर्ण वजह बना।

परिवार का सहयोग बना मजबूत आधार
वृंदा की इस उपलब्धि के पीछे उनके परिवार का भी अहम योगदान रहा। उनके पिता नरेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि उन्हें अपनी बेटी पर बेहद गर्व है। उन्होंने यह भी बताया कि वृंदा ने कभी किसी सुविधा की मांग नहीं की और सीमित संसाधनों में ही अपनी पढ़ाई पूरी की।
उनकी मां रतन कंवर ने बताया कि वृंदा ने हमेशा घर और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाए रखा। जब भी घर में जरूरत होती, वह जिम्मेदारियां निभाने से पीछे नहीं हटती थीं। यहां तक कि आज भी नौकरी के बाद घर के कामों में सहयोग करती हैं।
मेहनत और विनम्रता का अनूठा उदाहरण
वृंदा की सफलता केवल परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस विनम्रता और जिम्मेदारी का उदाहरण भी है, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों को बहाना नहीं बनाया, बल्कि उन्हें अपनी ताकत में बदल दिया।
उनकी यह यात्रा उन लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।









