पर्यावरण की रक्षा कैसे संभव है? रिटायर्ड जस्टिस ए.के. ओका ने बताए दीर्घकालिक समाधान

पर्यावरण की रक्षा कैसे संभव है? रिटायर्ड जस्टिस ए.के. ओका ने बताए दीर्घकालिक समाधान

देश इस समय एक गंभीर पर्यावरण संकट से गुजर रहा है। दिल्ली-एनसीआर में इस साल जिस स्तर का प्रदूषण देखने को मिला है, वह बेहद चिंताजनक और अप्रत्याशित है।

नई दिल्ली: भारत इस समय गंभीर पर्यावरण संकट के दौर से गुजर रहा है। खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरी क्षेत्रों में बढ़ता वायु प्रदूषण न सिर्फ जनस्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुका है, बल्कि यह साफ संकेत देता है कि समस्या अस्थायी या मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक और दीर्घकालिक है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट भी लगातार सुनवाई कर रहा है और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत सहित कई न्यायाधीश मान चुके हैं कि केवल तात्कालिक उपायों से समाधान संभव नहीं है। इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अभय एस. ओका ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यापक दृष्टिकोण सामने रखा है।

नागरिकों की भागीदारी से ही आएगा बदलाव

रिटायर्ड जस्टिस ओका का मानना है कि पर्यावरण की रक्षा तब तक संभव नहीं है, जब तक देश का हर नागरिक इसे अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं समझता। उनके अनुसार, “संविधान के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन हम अब तक पर्यावरण की रक्षा को अपने कर्तव्य के रूप में नहीं देख पाए हैं। जब तक यह सोच आम नागरिकों में विकसित नहीं होगी कि पर्यावरण को सुरक्षित रखना उनकी भी जिम्मेदारी है, तब तक बदलाव संभव नहीं है।”

उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर पर्यावरण संरक्षण को केवल कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं (एक्टिविस्ट) या अदालतों की जिम्मेदारी मान लिया गया, तो समस्या और गहराती जाएगी। वास्तविक समाधान तभी निकलेगा, जब समाज का हर वर्ग—आम नागरिक, उद्योग, सरकार और संस्थाएं—सामूहिक जिम्मेदारी निभाएं।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और जजों को बनाया जाता है निशाना

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस ओका ने यह भी बताया कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाने वालों को अक्सर निशाना बनाया जाता है। चाहे वे पर्यावरण कार्यकर्ता हों या फिर न्यायपालिका से जुड़े लोग। उन्होंने कहा कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ताओं को “धर्म-विरोधी” या “देश-विरोधी” बताकर बदनाम किया जाता है, जबकि उन्हें समाज द्वारा सम्मान मिलना चाहिए।

उन्होंने यह भी खुलासा किया कि जजों पर भी सोशल मीडिया और राजनीतिक स्तर पर हमले होते हैं। उदाहरण देते हुए जस्टिस ओका ने बताया कि जब वे ध्वनि प्रदूषण और धार्मिक आयोजनों के दौरान सड़कों पर बनाए गए पंडालों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे थे, तब महाराष्ट्र सरकार की ओर से उनके इरादों पर पक्षपात का आरोप लगाने की कोशिश की गई। हालांकि, उस समय बॉम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।

संविधान और पर्यावरण संरक्षण

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है। इसमें सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों की रक्षा करे। साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 51(ए) के तहत प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य भी है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार में योगदान दे।

हालांकि, जस्टिस ओका ने यह भी रेखांकित किया कि नीति निदेशक तत्वों को अदालतों द्वारा सीधे लागू नहीं कराया जा सकता। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण की संवैधानिक भावना अक्सर व्यवहार में कमजोर पड़ जाती है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि कानून तो मौजूद हैं, लेकिन सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी के अभाव में उनका प्रभाव सीमित रह जाता है।

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