पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों “45 दिन” की समयसीमा चर्चा के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने हालिया राज्य दौरे के दौरान घोषणा की कि यदि बंगाल में भाजपा की सरकार बनती है तो 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू कर दिया जाएगा।
कोलकाता: West Bengal की राजनीति में इन दिनों 45 दिन की समयसीमा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। हाल ही में राज्य के दौरे पर पहुंचे केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कहा कि अगर बंगाल में Bharatiya Janata Party की सरकार बनती है, तो 45 दिनों के भीतर Seventh Pay Commission लागू कर दिया जाएगा।
इस बयान के बाद राज्य की सियासत में बहस तेज हो गई है। सरकारी कर्मचारी, शिक्षक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा इस घोषणा को लेकर चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि लंबे समय से वे वेतन आयोग लागू करने की मांग करते रहे हैं। वहीं सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और वामपंथी दलों ने इस वादे को चुनावी रणनीति बताते हुए सवाल उठाए हैं कि क्या इसे वास्तव में लागू करना संभव होगा या नहीं।
अमित शाह का बयान और प्रमुख वादे

अपने संबोधन में Amit Shah ने कहा कि भाजपा की सरकार बनने पर 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राज्य में खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती प्रक्रिया 26 दिसंबर से शुरू की जाएगी। इसके अलावा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए अधिकतम आयु सीमा में पांच वर्ष की विशेष छूट देने का आश्वासन भी दिया गया। शाह ने दावा किया कि नई भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और मेरिट आधारित होगी, जिससे युवाओं का भरोसा बहाल किया जा सकेगा।
भाजपा का कहना है कि यह केवल चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट समयबद्ध योजना है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो 45 दिनों में प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी करना संभव है।
ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने इस घोषणा को भ्रामक करार दिया है। उनका कहना है कि राज्य सरकार पहले ही वेतन आयोग से संबंधित प्रक्रिया पूरी कर चुकी है और कर्मचारियों के हितों की अनदेखी नहीं की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में कर्मचारियों के लिए कैशलेस स्वास्थ्य योजना और पारंपरिक पेंशन व्यवस्था जारी है। बनर्जी ने भाजपा पर आरोप लगाया कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, वहां पुरानी पेंशन व्यवस्था को समाप्त किया गया है, जबकि बंगाल में इसे बरकरार रखा गया है।
तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने भी इस वादे को चुनावी रणनीति बताते हुए सवाल उठाए हैं कि वित्तीय दबाव झेल रहे राज्य में इतनी कम अवधि में सातवां वेतन आयोग लागू करना कितना व्यावहारिक होगा।
कर्मचारी संगठनों की राय
भाजपा समर्थित कर्मचारी संगठनों ने इसे “साहसिक और निर्णायक” कदम बताया है। उनका कहना है कि यदि स्पष्ट नीति और संसाधन उपलब्ध हों तो समयसीमा में काम पूरा किया जा सकता है। वहीं, अन्य कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि राज्य पहले से ही डीए बकाया और वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में 45 दिनों की समयसीमा व्यवहारिक रूप से कठिन प्रतीत होती है। उनका सवाल है कि क्या इसके लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधान किए गए हैं।
राज्य में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। आयु सीमा में पांच वर्ष की संभावित छूट उन्हें सीधा लाभ दे सकती है। कई अभ्यर्थियों का मानना है कि यदि यह निर्णय लागू होता है तो हजारों युवाओं को सरकारी नौकरियों में अवसर मिलेगा। हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि किसी भी घोषणा की वास्तविक सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। चुनावी वादों और प्रशासनिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होती है।










