भारतीय इतिहास में कुछ शासक ऐसे हुए हैं, जिन्होंने केवल तलवार के बल पर नहीं, बल्कि अपनी दूरदर्शिता, कूटनीति और रणनीतिक सोच से सत्ता संतुलन बदल दिया।
राजस्थान: भरतपुर के राजा सूरजमल का भारतीय इतिहास में अत्यंत ऊँचा स्थान है। वे एक महान जाट शासक थे, जिनका शासनकाल 1745 से 1763 तक रहा। अपनी दूरदर्शिता, कूटनीति और अद्भुत रणनीतिक कौशल के लिए वे प्रसिद्ध थे। राजा सूरजमल अग्रसोची और कुशल रणनीतिकार थे, जो किसी भी चुनौती को पहले ही भांपकर अपनी कार्ययोजना तैयार कर लेते थे। कब संधि करनी है, कब आक्रमण करना है और कब गठबंधन बनाकर संभावित खतरे को टालना है—इन सभी नीतियों का वे बेहद चतुराई से प्रयोग करते थे।
युद्ध में वे दुश्मनों के खजाने और रसद को लूटकर अपने सैनिकों में बाँट देते थे, जिससे उनके सैनिक सदैव संतुष्ट और निष्ठावान बने रहते थे। इसी कारण राजा सूरजमल ने करीब 80 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। मध्यकालीन भारत में शायद ही किसी हिंदू राजा ने इतनी व्यापक और निरंतर सैन्य सफलता हासिल की हो।
महाराजा सूरजमल: एक दूरदर्शी शासक
महाराजा सूरजमल का शासनकाल 1745 से 1763 तक रहा। वे केवल भरतपुर रियासत के शासक नहीं थे, बल्कि पूरे उत्तर भारत की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले रणनीतिकार थे। वे चुनौतियों को पहले ही भांप लेते थे और उसी अनुसार अपनी नीति तय करते थे—कब संधि करनी है, कब युद्ध और कब गठबंधन, इसका उन्हें गहरा ज्ञान था।
उनकी सबसे बड़ी खासियत थी सैनिकों के प्रति व्यवहार। वे दुश्मनों से लूटी गई संपत्ति को अपने सैनिकों में बांटते थे, जिससे सेना न केवल संतुष्ट रहती थी बल्कि पूरी निष्ठा से उनके लिए लड़ती थी। यही कारण था कि सूरजमल ने अपने जीवन में लगभग 80 युद्ध लड़े और लगभग सभी में विजय हासिल की, जो मध्यकालीन भारत में असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।
क्यों कहलाए ‘राजस्थान का चाणक्य’?
चाणक्य को भारत का महानतम कूटनीतिज्ञ माना जाता है। जैसे चाणक्य ने अर्थशास्त्र में राज्य संचालन के सूत्र दिए, वैसे ही सूरजमल ने व्यवहारिक राजनीति में इन सिद्धांतों को जमीन पर उतारा। वे शक्ति संतुलन, रसद प्रबंधन, खुफिया जानकारी और मनोवैज्ञानिक युद्ध में माहिर थे। इतिहासकारों का मानना है कि सूरजमल ने भारत को एक समग्र राष्ट्र के रूप में देखा, न कि केवल क्षेत्रीय सत्ता के तौर पर। इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण वे भरतपुर से आगे बढ़कर भारतीय इतिहास के गौरव बने।
1753 तक सूरजमल उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजाओं में गिने जाने लगे थे। उनकी सेना में लगभग 75 हजार पैदल सैनिक और 38 हजार घुड़सवार थे। उन्होंने कुछ फ्रांसीसी सैनिकों को भाड़े पर रखा, जिन्होंने उन्हें यूरोप की आधुनिक युद्ध तकनीक सिखाई। इसी के प्रभाव से सूरजमल ने अपनी सेना में गतिशील तोपखाने (मोबाइल आर्टिलरी) को शामिल किया, जो उस दौर में बेहद आधुनिक मानी जाती थी। यही तकनीक बाद में मुगलों के खिलाफ निर्णायक साबित हुई।

दिल्ली की राजनीति और सूरजमल की कूटनीति
1748 में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता और कमजोर हो गई। अहमद शाह बहादुर के शासनकाल में वजीर सफदरजंग से संघर्ष शुरू हुआ। जब सफदरजंग से अवध की सूबेदारी छीन ली गई, तो उसने सूरजमल से मदद मांगी। मार्च 1753 में सूरजमल और सफदरजंग ने मिलकर दिल्ली को घेर लिया। मई 1753 में सूरजमल ने फिरोज शाह कोटला पर कब्जा कर लिया और दिल्ली के बाहरी इलाकों को कमजोर कर दिया। यह केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक चाल थी।
सूरजमल की सलाह पर सफदरजंग ने एक समानांतर मुगल सम्राट की घोषणा कर दी, जिससे विद्रोह को वैधता मिल गई। यह कदम मुगल सत्ता की जड़ों पर करारा प्रहार था।
आधुनिक युद्ध रणनीति से मुगलों की हार
फिरोज शाह कोटला की लड़ाई में सूरजमल ने बेहतरीन युद्धनीति अपनाई। पहले घुड़सवार सेना से हमला किया, फिर मुगल सैनिकों को खुले मैदान में खींच लाया, जहां ऊंचाई पर तैनात तोपों से जबरदस्त गोलाबारी की गई। इस रणनीति से मुगल सेना में भगदड़ मच गई और निर्णायक जीत मिली। 1761 में सूरजमल ने आगरा पर आक्रमण कर आगरा के लाल किले पर अधिकार कर लिया।
किले को गंगाजल से शुद्ध किया गया और मुगल प्रतीकों को हटा दिया गया। यह प्रतीकात्मक रूप से मुगल सत्ता के अंत का संकेत था। सूरजमल की मृत्यु 1763 में हुई, लेकिन आगरा का किला 1774 तक भरतपुर शासकों के अधीन रहा।












