राजस्थान के सीकर में RGHS फर्जीवाड़े मामले में SOG ने दो डॉक्टरों को गिरफ्तार किया, जबकि चार आरोपी फरार हैं। गिरफ्तारी के विरोध में जिलेभर के करीब 380 डॉक्टर हड़ताल पर चले गए, जिससे अस्पतालों की ओपीडी सेवाएं प्रभावित हुईं और मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ी।
सीकर: राजस्थान के सीकर जिले में राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) से जुड़े कथित फर्जीवाड़े को लेकर स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) की बड़ी कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हो गई है। SOG ने सरकारी और निजी क्षेत्र से जुड़े डॉक्टरों पर कार्रवाई करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार किया, जबकि चार अन्य आरोपी डॉक्टर फरार बताए जा रहे हैं।
इस कार्रवाई के विरोध में जिलेभर के सरकारी और निजी डॉक्टर हड़ताल पर चले गए हैं। हड़ताल के कारण मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए अस्पताल सेवाएं चलाने की कोशिश कर रहा है।
RGHS घोटाला क्या है?
राजस्थान सरकार की RGHS योजना सरकारी कर्मचारियों, पेंशनर्स और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई थी। लेकिन जांच एजेंसियों का आरोप है कि कुछ डॉक्टरों और निजी लैब संचालकों ने इस योजना का गलत इस्तेमाल किया।

प्रारंभिक जांच में सामने आया कि सामान्य बीमारी वाले मरीजों को भी महंगी जांचें, विशेष रूप से MRI जैसी स्कैनिंग, लिखी जा रही थीं। आरोप है कि निजी लैब्स के साथ कथित मिलीभगत कर सरकारी फंड का दुरुपयोग किया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि कई मरीजों को ऐसी जांचों के लिए भेजा गया, जिनकी चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं थी।
चेकअप के बहाने घर पहुंची SOG टीम
SOG की कार्रवाई का तरीका भी चर्चा का विषय बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, एक टीम ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी CBI से जुड़ा बताते हुए मेडिकल कॉलेज परिसर में प्रवेश किया।
इसके बाद टीम पूर्व अधीक्षक डॉ. के.के. अग्रवाल के आवास तक पहुंची। सूत्रों के मुताबिक, टीम ने सामान्य मेडिकल चेकअप का बहाना बनाकर घर में प्रवेश किया और पहचान की पुष्टि होने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
दूसरी टीम ने निजी लैब संचालक डॉ. बनवारी लाल चौधरी को उनके घर से हिरासत में लिया। SOG अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई लंबे समय से चल रही जांच के आधार पर की गई।
चार डॉक्टर फरार, तलाश जारी
कार्रवाई की सूचना मिलते ही चार अन्य आरोपी डॉक्टर कथित तौर पर फरार हो गए। जांच एजेंसियां उनकी तलाश में लगातार दबिश दे रही हैं।
फरार बताए जा रहे डॉक्टरों में सरकारी अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े चिकित्सकों के नाम शामिल हैं।
जांच अधिकारियों के अनुसार, इन डॉक्टरों की भूमिका कथित फर्जी जांच और रेफरल नेटवर्क में होने का संदेह है।
अस्पतालों में सेवाएं प्रभावित
गिरफ्तारियों के विरोध में सीकर जिले के लगभग 380 डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। सरकारी डॉक्टरों ने अस्पताल परिसर में धरना दिया और नारेबाजी की।
निजी डॉक्टरों ने भी कुछ घंटों के लिए ओपीडी सेवाएं बंद रखीं। इसका सबसे अधिक असर सामान्य मरीजों पर पड़ा, जिन्हें इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा।
हालांकि प्रशासन ने रेजिडेंट डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ की मदद से आपातकालीन सेवाएं जारी रखने का प्रयास किया।
मरीजों को झेलनी पड़ी परेशानी
हड़ताल के चलते अस्पतालों में दूर-दराज के इलाकों से आए मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई मरीजों ने बताया कि उन्हें पहले से हड़ताल की जानकारी नहीं थी।
कुछ मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ा, जबकि कई लोगों को दूसरी तारीख पर आने की सलाह दी गई।
हालांकि अस्पताल प्रशासन ने स्पष्ट किया कि गंभीर मरीजों और इमरजेंसी सेवाओं को प्रभावित नहीं होने दिया गया।
डॉक्टरों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल
डॉक्टर संगठनों ने SOG की कार्रवाई और गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कार्रवाई “असंवैधानिक” तरीके से की गई।
प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों ने मांग की कि मामले की निष्पक्ष विभागीय जांच कराई जाए और गिरफ्तार डॉक्टरों को कानूनी प्रक्रिया के तहत उचित मौका दिया जाए।
डॉक्टर संगठनों का आरोप है कि चिकित्सा समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
पहले भी हो चुकी थी कार्रवाई
यह मामला नया नहीं है। लगभग तीन महीने पहले भी RGHS योजना में कथित अनियमितताओं को लेकर सात डॉक्टरों को निलंबित किया गया था। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कुछ मरीजों को मामूली बीमारी के बावजूद महंगी जांचें लिखी गईं।
उदाहरण के तौर पर पेट दर्द की शिकायत वाले मरीजों को घुटनों की MRI कराने के लिए भेजा गया। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच SOG को सौंपी गई थी।
स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह मामला एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल हेल्थ स्कीम्स और इंश्योरेंस आधारित योजनाओं में फर्जी क्लेम, अनावश्यक टेस्ट और निजी संस्थानों के साथ सांठगांठ जैसी समस्याएं लगातार सामने आती रही हैं।
यदि निगरानी तंत्र मजबूत न हो तो सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग आसान हो जाता है।
निजी लैब और अस्पतालों की भूमिका जांच के दायरे में
जांच एजेंसियां अब निजी लैब्स और डायग्नोस्टिक सेंटरों की भूमिका भी खंगाल रही हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में अधिक कमाई के लिए गैर-जरूरी मेडिकल जांचें लिखी जाती थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कई देशों में हेल्थ इंश्योरेंस फ्रॉड और मेडिकल बिलिंग घोटाले बड़ी समस्या बन चुके हैं। भारत में भी स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडिट सिस्टम को मजबूत करने की मांग लंबे समय से उठती रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर हड़ताल का असर
हालांकि डॉक्टरों की हड़ताल सीमित समय के लिए बताई गई, लेकिन इससे यह बहस तेज हो गई है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि भ्रष्टाचार या फर्जीवाड़े की जांच जरूरी है, लेकिन मरीजों की सेवाएं प्रभावित न हों, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
प्रशासन की क्या तैयारी?
जिला प्रशासन ने दावा किया है कि अस्पताल सेवाओं को सामान्य बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मेडिकल स्टाफ तैनात किया गया है। अधिकारियों ने कहा कि ऑपरेशन और आपातकालीन सेवाएं जारी हैं। केवल ओपीडी सेवाओं में सीमित असर पड़ा है।प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और संयम बनाए रखने की अपील की है।










