Mohan Bhagwat ने सोमवार को संस्कृत सीखने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत निरंतरता का अहम हिस्सा है। वे दिल्ली में Sanskrit Bharati के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन समारोह में संबोधित कर रहे थे।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के प्रमुख Mohan Bhagwat ने सोमवार को संस्कृत भाषा को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और विचारधारा की आत्मा है। उन्होंने लोगों, खासकर युवाओं से इस भाषा को सीखने और अपनाने की अपील की।
यह बयान नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया गया, जहां संस्कृत के प्रचार-प्रसार से जुड़ी संस्था Sanskrit Bharati के केंद्रीय कार्यालय का उद्घाटन किया गया।
“संस्कृत राष्ट्र की आत्मा है” - मोहन भागवत
सभा को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन और जीवंत परंपरा का आधार है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक या राजनीतिक इकाई नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरता है, जिसकी आत्मा संस्कृत में निहित है। उन्होंने कहा, “संस्कृत एक भाषा है, लेकिन यह सिर्फ भाषा नहीं है। यह भारत की सोच, जीवन और संस्कृति की सबसे पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।”
उनके अनुसार, भारत की पहचान केवल सीमाओं या शासन व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विरासत से बनती है, जिसमें संस्कृत की अहम भूमिका है।
छात्रों के लिए संस्कृत को “कठिन” मानने की धारणा पर टिप्पणी
भागवत ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि स्कूल के दिनों में उन्हें भी संस्कृत कठिन लगती थी। उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम में श्लोक याद करने पर जोर दिया जाता था, जिससे छात्रों में यह धारणा बन जाती है कि यह एक कठिन भाषा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्हीं श्लोकों को घर या दैनिक जीवन में स्वाभाविक रूप से सुना जाता है, तो वे आसान लगने लगते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर संस्कृत को कठिन क्यों माना जाता है, जबकि भाषा सीखने का सबसे सरल तरीका उसे सुनना और बोलना है, न कि केवल किताबों तक सीमित रहना।

भाषा सीखने की प्राकृतिक प्रक्रिया पर जोर
मोहन भागवत ने भाषा सीखने के प्राकृतिक तरीके पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी भाषा को सीखने के लिए उसमें डूब जाना सबसे प्रभावी तरीका है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब वे भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा करते हैं, तो भले ही स्थानीय भाषाओं के शब्दों का ज्ञान न हो, लेकिन वे भाव और अर्थ को समझ लेते हैं। यह निरंतर सुनने और संवाद का परिणाम होता है।
उनके अनुसार, “भाषा सीखने का सबसे अच्छा तरीका है—लोगों के बीच रहना, उन्हें सुनना और लगातार उस भाषा का प्रयोग करना। अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 15 वर्षों में संस्कृत के प्रति समाज का दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदल रहा है। अब लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर अधिक रुचि दिखा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में संस्कृत को पुनर्जीवित करना और इसे आधुनिक संचार का हिस्सा बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। इस दिशा में संस्कृत भारती जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।










