सैटेलाइट इंटरनेट पारंपरिक केबल और मोबाइल टावर से अलग तकनीक है, जो अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट के जरिए कनेक्टिविटी देता है। यह विशेष रूप से दूर-दराज इलाकों, आपदा प्रबंधन और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेज और भरोसेमंद इंटरनेट पहुंचाने के लिए अहम माना जा रहा है।
Satellite Internet in India: भारत सहित दुनिया भर में सैटेलाइट इंटरनेट को मजबूत कनेक्टिविटी के नए विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है, जहां केबल और टावर आधारित नेटवर्क कमजोर हैं। यह तकनीक अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और यूजर की डिश के जरिए काम करती है। शहरी और दूरस्थ दोनों क्षेत्रों में इसकी जरूरत तेज इंटरनेट, आपदा के समय संचार और सीमावर्ती इलाकों में संपर्क बनाए रखने के लिए महसूस की जा रही है। GEO, MEO और LEO जैसे अलग-अलग ऑर्बिट इसके अलग-अलग मॉडल तय करते हैं।
सैटेलाइट इंटरनेट कैसे काम करता है?
सैटेलाइट इंटरनेट जमीन पर बिछे केबल या मोबाइल टावर पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट पर निर्भर करता है। यूजर के घर की छत पर लगी सैटेलाइट डिश रेडियो वेव्स के जरिए सैटेलाइट से डेटा भेजती और प्राप्त करती है। यह सैटेलाइट आगे ग्राउंड स्टेशन और डेटा सेंटर से जुड़ा होता है, जो इंटरनेट की मुख्य रीढ़ है। इसी रास्ते से यूजर तक इंटरनेट पहुंचता है।
इस पूरी प्रक्रिया में तीन अहम हिस्से होते हैं यूजर की सैटेलाइट डिश, अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और जमीन पर मौजूद डेटा सेंटर। इन तीनों के तालमेल से बिना किसी केबल या फाइबर के इंटरनेट सेवा संभव हो पाती है। यही वजह है कि यह तकनीक पहाड़ों, जंगलों और सीमावर्ती इलाकों जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी कारगर साबित होती है।

क्यों पड़ी सैटेलाइट इंटरनेट की जरूरत?
ग्राउंड बेस्ड नेटवर्क यानी मोबाइल टावर और फाइबर नेटवर्क शहरों और घनी आबादी वाले इलाकों में तो मजबूत हैं, लेकिन दूर-दराज क्षेत्रों में अब भी बड़ी आबादी इंटरनेट से कटी हुई है। इसके अलावा बाढ़, भूकंप या चक्रवात जैसी आपदाओं में टावर और केबल नेटवर्क सबसे पहले प्रभावित होते हैं।
यहीं सैटेलाइट इंटरनेट की जरूरत सामने आती है। यह तकनीक ऑन-डिमांड कनेक्टिविटी देती है और किसी भी इलाके में तेजी से इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। सीमावर्ती क्षेत्रों, आपदा प्रबंधन, सैन्य संचार, जहाजों और हवाई सेवाओं में इसकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों को भी इससे बड़ा सहारा मिल सकता है।
GEO, MEO और LEO सैटेलाइट में क्या फर्क है?
सैटेलाइट इंटरनेट के लिए अलग-अलग ऊंचाई पर सैटेलाइट लगाए जाते हैं। जियोस्टेशनरी ऑर्बिट यानी GEO सैटेलाइट करीब 35,786 किलोमीटर ऊपर होते हैं और एक साथ पृथ्वी का बड़ा हिस्सा कवर करते हैं, लेकिन इनमें लेटेंसी बेहद ज्यादा होती है।
मीडियम अर्थ ऑर्बिट या MEO सैटेलाइट 2,000 से 35,786 किलोमीटर की ऊंचाई पर होते हैं और इनकी लेटेंसी GEO से कम होती है, लेकिन इन्हें बड़ी संख्या में लगाना महंगा पड़ता है। वहीं लो-अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट 2,000 किलोमीटर से नीचे लगाए जाते हैं। स्टारलिंक इसी तकनीक पर काम करता है। ये सैटेलाइट कम ऊंचाई पर होने की वजह से तेज स्पीड और कम लेटेंसी देते हैं। स्टारलिंक के पास फिलहाल करीब 7,000 LEO सैटेलाइट हैं, जिन्हें 42,000 तक बढ़ाने की योजना है।
सैटेलाइट इंटरनेट के फायदे और नुकसान
सैटेलाइट इंटरनेट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह रिमोट इलाकों तक तेज इंटरनेट पहुंचा सकता है। आपदा के समय भी इसकी सेवाएं ज्यादा प्रभावित नहीं होतीं। जैसे-जैसे इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, वैसे-वैसे यूजर्स को बेहतर स्पीड और किफायती प्लान मिलने की उम्मीद भी बढ़ी है।
लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं। इसकी शुरुआती सेटअप लागत काफी ज्यादा होती है। सैटेलाइट पर निर्भरता के कारण लेटेंसी पूरी तरह खत्म नहीं होती, जिससे ऑनलाइन गेमिंग और रियल-टाइम ट्रांजैक्शन जैसे काम प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही सैटेलाइट लॉन्च करना बेहद महंगा सौदा है, जिसका असर सीधे सेवा की कीमत पर पड़ता है।











