भारत में Satellite Internet के नए नियम जल्द, विदेशी कंपनियों को भारतीय साझेदार के साथ करना पड़ सकता है काम

भारत सरकार Satellite Internet के लिए नए नियम ला सकती है। विदेशी कंपनियों को भारतीय साझेदार और सुरक्षा मंजूरी जरूरी होगी।

भारत सरकार सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए नए स्पेक्ट्रम नियम लाने की तैयारी में है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत विदेशी कंपनियों को सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम के लिए भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करना पड़ सकता है।

Tech: Satellite Internet सेवाओं को लेकर भारत सरकार जल्द नई स्पेक्ट्रम आवंटन नीति ला सकती है। प्रस्तावित नियमों का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना और भारतीय सैटेलाइट कंपनियों के हितों की रक्षा करना है। इसके तहत विदेशी सैटकॉम कंपनियों को भारत में सेवाएं शुरू करने के लिए स्थानीय कंपनियों के साथ सहयोग करना पड़ सकता है।

सैटेलाइट इंटरनेट के लिए नए नियमों की तैयारी

भारत सरकार और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए नई नियामकीय व्यवस्था तैयार कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दूरसंचार विभाग (DoT) जल्द स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।

प्रस्तावित नियमों के तहत Starlink, Eutelsat OneWeb और अन्य विदेशी सैटेलाइट संचार कंपनियों को भारत में संचालन के लिए भारतीय कंपनियों के साथ समन्वय करना पड़ सकता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के अंतरिक्ष संचार नेटवर्क में भारतीय कंपनियों की प्रभावी भागीदारी बनी रहे और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मानकों का पालन हो।

भारतीय कंपनियों के हितों की सुरक्षा पर जोर

सूत्रों के अनुसार, सरकार ऐसे नियम बनाने पर विचार कर रही है ताकि वैश्विक कंपनियां भारतीय सैटेलाइट ऑपरेटरों के कामकाज में किसी प्रकार की बाधा न बनें। अधिकारियों का मानना है कि यदि शुरुआती चरण में समन्वय सुनिश्चित नहीं किया गया, तो भविष्य में भारतीय कंपनियों के लिए ऑर्बिटल स्लॉट और नेटवर्क संचालन में तकनीकी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

सरकार का यह भी मानना है कि अंतरिक्ष आधारित संचार सेवाएं राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ी होती हैं। इसलिए स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरी की प्रक्रिया में भारतीय भागीदारी को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

किन कंपनियों को मिली है मंजूरी

अब तक एलन मस्क की Starlink, भारती समूह समर्थित Eutelsat OneWeb और SES के साथ जियो के संयुक्त उद्यम को IN-SPACe से आवश्यक स्वीकृतियां और DoT से NGSO कॉन्स्टेलेशन के लिए परमिट मिल चुके हैं। हालांकि, इन कंपनियों को अभी अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार है।

वहीं, अमेजन की सैटेलाइट इंटरनेट परियोजना Project Kuiper के लिए भी आवेदन किया गया है, लेकिन उसे अभी संबंधित सरकारी एजेंसियों से अंतिम स्वीकृति नहीं मिली है।

ऑर्बिटल स्लॉट और तकनीकी समन्वय क्यों है जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, सैटेलाइट संचार सेवाओं में ऑर्बिटल स्लॉट और रेडियो फ्रीक्वेंसी का समन्वय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि पहले से मौजूद ऑपरेटर नए नेटवर्क के साथ तकनीकी सहयोग नहीं करते, तो सिग्नल इंटरफेरेंस जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

इसी कारण सरकार ऐसी व्यवस्था चाहती है जिसमें भारतीय और विदेशी कंपनियां मिलकर नेटवर्क का संचालन करें। इससे भविष्य में नई भारतीय कंपनियों के लिए भी अंतरिक्ष संचार क्षेत्र में प्रवेश आसान होगा और सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी।

जियो की बड़ी सैटेलाइट इंटरनेट योजना

रिपोर्ट के अनुसार, जियो अपने सैटेलाइट नेटवर्क को इस तरह विकसित कर रही है कि भविष्य में अन्य भारतीय NGSO कॉन्स्टेलेशन के साथ भी उसका समन्वय हो सके। कंपनी ब्रॉडबैंड, सेल्युलर बैकहॉल और डायरेक्ट-टू-डिवाइस जैसी सेवाएं शुरू करने की योजना पर काम कर रही है।

इसके लिए देशभर में लगभग 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन स्थापित किए जाने की तैयारी है। कंपनी का लक्ष्य पूरे भारत में 4 से 4.5 टेराबिट प्रति सेकेंड तक इंटरनेट क्षमता उपलब्ध कराना है, जो वर्तमान में स्वीकृति प्राप्त वैश्विक सैटेलाइट नेटवर्क परियोजनाओं की तुलना में काफी अधिक मानी जा रही है।

यदि प्रस्तावित नियम लागू होते हैं, तो भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं का विस्तार राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थानीय उद्योग और वैश्विक कंपनियों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ाया जाएगा।

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