SEBI का नया Settlement Formula लागू, ₹10 लाख तक के मामलों का तेजी से होगा निपटारा

SEBI Settlement Rules Update: सेबी के नए सेटलमेंट फॉर्मूले के तहत 10 लाख रुपये तक के मामलों के निपटारे की प्रक्रिया तेज होने की खबर है। जानिए नए नियमों का

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने शेयर बाजार में नियमों का उल्लंघन करने से जुड़े मामलों की सेटलमेंट प्रक्रिया में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब 10 लाख रुपये तक की सेटलमेंट राशि वाले मामलों का निपटारा तेजी से किया जा सकेगा।

बिजनेस न्यूज़: शेयर बाजार में नियमों का उल्लंघन करने से जुड़े मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने नए सेटलमेंट नियम अधिसूचित किए हैं। नए ढांचे के तहत ₹10 लाख तक की सेटलमेंट राशि वाले पात्र मामलों को फास्ट-ट्रैक सुविधा के जरिए निपटाया जा सकेगा। 

इसके अलावा, सेटलमेंट की रकम तय करने के तरीके में भी बदलाव किया गया है। इस कदम का उद्देश्य नियामकीय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, स्पष्ट और अनुमान के मुताबिक बनाना है, ताकि छोटे मामलों में लंबे समय तक कार्रवाई लंबित न रहे।

सेटलमेंट राशि तय करने के लिए नया फॉर्मूला

SEBI की 6 अक्टूबर की अधिसूचना के अनुसार, नए सेटलमेंट फ्रेमवर्क में सबसे पहले मामले के लिए एक आधार राशि निर्धारित की जाएगी। यह राशि संबंधित उल्लंघन पर प्रतिभूति कानूनों के तहत लागू न्यूनतम जुर्माने से जुड़ी होगी। इसके बाद मामले की परिस्थितियों के आधार पर अंतिम सेटलमेंट राशि में बदलाव किया जा सकता है।

रकम तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, संबंधित पक्ष के खिलाफ पहले की गई नियामकीय कार्रवाई, मामले को गंभीर बनाने वाले या राहत देने वाले कारकों और कानूनी खर्चों जैसे पहलुओं पर विचार किया जाएगा। इस व्यवस्था से अलग-अलग मामलों में सेटलमेंट राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

नए फॉर्मूले का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि बाजार में नियमों का उल्लंघन करने वाले पक्षों को पहले से बेहतर अंदाजा मिल सके कि सेटलमेंट के लिए कितनी रकम चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, अंतिम राशि मामले के तथ्यों और लागू नियमों पर निर्भर करेगी।

गलत कमाई और निवेशकों के नुकसान की होगी अलग गणना

नए नियमों में गलत तरीके से अर्जित लाभ, नुकसान से बचाई गई रकम और निवेशकों को हुए नुकसान की गणना को सेटलमेंट राशि से अलग रखने का प्रावधान किया गया है। यदि इन रकमों का आकलन संभव है, तो संबंधित राशि की वसूली अलग से की जा सकती है। इस बदलाव का उद्देश्य सेटलमेंट की गणना में दोहरी गिनती की संभावना को कम करना है। नए ढांचे के तहत सेटलमेंट राशि, गलत तरीके से कमाए गए धन की वापसी और नियामकीय सुधारों से जुड़ी शर्तों को अलग-अलग रखा जाएगा।

इसके साथ ही, पहले गैर-मौद्रिक शर्तों के रूप में पहचाने जाने वाले प्रावधानों को अब रेमेडियल एंड रेगुलेटरी टर्म्स (RRT) कहा गया है। इन शर्तों के तहत संबंधित पक्ष को आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक भुगतान के जरिए मामला समाप्त करना नहीं, बल्कि बाजार में नियमों के अनुपालन को भी सुनिश्चित करना है।

₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था

SEBI ने सेटलमेंट प्रक्रिया को तेज करने के लिए दो तरह की फास्ट-ट्रैक व्यवस्थाएं पेश की हैं। पहली व्यवस्था सेटलमेंट राशि की सीमा पर आधारित है, जबकि दूसरी उल्लंघन के प्रकार के आधार पर लागू हो सकती है। राशि आधारित व्यवस्था के तहत ₹10 लाख तक की सेटलमेंट राशि वाले पात्र मामलों को आंतरिक समिति की सामान्य प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर सीधे पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के समक्ष भेजा जा सकेगा। इससे ऐसे मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया कम समय में पूरी होने की संभावना है।

दूसरी व्यवस्था में उल्लंघन की निर्धारित श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले मामलों में SEBI संबंधित पक्ष को नोटिस देकर तय राशि का भुगतान करने के माध्यम से मामला निपटाने का अवसर दे सकता है। भुगतान और अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होने के बाद पूर्णकालिक सदस्यों का पैनल सेटलमेंट आदेश जारी करेगा। हालांकि, फास्ट-ट्रैक सुविधा का लाभ संबंधित मामले की पात्रता और लागू शर्तों के अधीन होगा।

वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े मामलों में भी मिल सकता है विकल्प

नए सेटलमेंट नियम वित्तीय विवरणों में गलत जानकारी देने या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी लागू हो सकते हैं, बशर्ते संबंधित पक्ष जरूरी सुधारात्मक कदम उठाए। इसमें वित्तीय जानकारी का उचित खुलासा करना और गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए या हटाए गए फंड को वापस लाना शामिल हो सकता है।

ऐसे मामलों में सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित पक्ष को सभी नियामकीय जिम्मेदारियों से छूट मिल जाएगी। मामले की प्रकृति के अनुसार आर्थिक भुगतान के साथ सुधारात्मक कार्रवाई और अन्य नियामकीय शर्तें भी लागू हो सकती हैं।

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