शशि थरूर का नेहरू पर संतुलित दृष्टिकोण, भाजपा पर भी साधा निशाना

शशि थरूर का नेहरू पर संतुलित दृष्टिकोण, भाजपा पर भी साधा निशाना

Shashi Tharoor ने KLIBF में कहा कि जवाहरलाल नेहरू भारतीय लोकतंत्र के संस्थापक थे। वे उनके अंधभक्त नहीं हैं। थरूर ने नेहरू की गलतियां स्वीकार कीं। साथ ही BJP पर हर समस्या का दोष नेहरू पर डालने का आरोप लगाया।

New Delhi: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केरल विधानसभा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव (Kerala Legislature International Book Festival – KLIBF) में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर अपनी स्पष्ट और संतुलित राय रखी। उन्होंने कहा कि नेहरू भारतीय लोकतंत्र के संस्थापक (founder of democracy) थे, लेकिन वे उनके अंधभक्त नहीं हैं। 

थरूर के अनुसार, किसी भी ऐतिहासिक नेता का मूल्यांकन करते समय उसकी उपलब्धियों और गलतियों दोनों को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि नेहरू की आलोचना करना लोकतंत्र विरोधी नहीं है, लेकिन हर समस्या के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना अनुचित है।

नेहरू के प्रति सम्मान, अंधभक्ति से इनकार

शशि थरूर ने अपने संबोधन में साफ कहा कि वे जवाहरलाल नेहरू के विचारों और दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशंसा का मतलब यह नहीं होता कि किसी नेता के हर फैसले का समर्थन किया जाए। थरूर के शब्दों में, वे नेहरू के प्रशंसक हैं, लेकिन बिना सोचे-समझे प्रशंसक नहीं हैं। उनका मानना है कि नेहरू ने भारत के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए, जिनकी आज भी सराहना की जाती है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नेहरू के कुछ निर्णय विवादास्पद रहे और उन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र की मजबूत नींव रखने में नेहरू की भूमिका

थरूर ने कहा कि भारत में लोकतंत्र की मजबूत नींव रखने का श्रेय जवाहरलाल नेहरू को जाता है। आज़ादी के बाद जिस तरह से उन्होंने संसदीय लोकतंत्र (parliamentary democracy) को स्थापित किया, वह भारत जैसे विविधताओं वाले देश के लिए आसान नहीं था। उन्होंने संस्थानों को मजबूत करने पर जोर दिया और संविधान की भावना को आगे बढ़ाया। थरूर के अनुसार, नेहरू ने यह सुनिश्चित किया कि सत्ता का केंद्रीकरण न हो और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए। यही कारण है कि वे नेहरू को भारतीय लोकतंत्र का प्रमुख निर्माता मानते हैं।

मोदी सरकार को लेकर थरूर का स्पष्ट बयान

शशि थरूर ने इस दौरान मोदी सरकार पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वे यह नहीं मानते कि मौजूदा सरकार लोकतंत्र विरोधी (anti-democratic) है, लेकिन उनका रुख निश्चित रूप से नेहरू विरोधी है। थरूर के अनुसार, मोदी सरकार ने नेहरू को एक सुविधाजनक बलि का बकरा (convenient scapegoat) बना दिया है। उनका कहना था कि जब भी कोई समस्या सामने आती है, तो उसे ऐतिहासिक संदर्भ में समझने के बजाय नेहरू पर दोष मढ़ दिया जाता है। इससे न तो वर्तमान की चुनौतियों का समाधान निकलता है और न ही स्वस्थ राजनीतिक बहस हो पाती है।

1962 का युद्ध और नेहरू की जिम्मेदारी

थरूर ने नेहरू की गलतियों को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने कहा कि 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में भारत की हार के लिए नेहरू के कुछ फैसलों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह स्वीकार करना जरूरी है कि उस समय रणनीतिक स्तर पर कुछ चूक हुई थीं। थरूर के अनुसार, इतिहास को ईमानदारी से देखने का मतलब यही है कि जहां गलतियां हुईं, वहां उन्हें स्वीकार किया जाए। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक ही घटना के आधार पर नेहरू के पूरे योगदान को खारिज करना न्यायसंगत नहीं है।

Leave a comment