स्कंद षष्ठी 2026: भगवान कार्तिकेय की पूजा का शुभ दिन, जानें व्रत और महत्व

स्कंद षष्ठी 2026 का व्रत 16 सितंबर को रखा जाएगा। भगवान कार्तिकेय की पूजा, व्रत विधि, धार्मिक महत्व और इस दिन की मान्यताओं के बारे में जानें।

स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को समर्पित महत्वपूर्ण तिथि है। सितंबर 2026 में यह व्रत 16 सितंबर को रखा जाएगा। इस दिन भक्त उपवास, पूजा और प्रार्थना के जरिए भगवान कार्तिकेय का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।

स्कंद षष्ठी 2026: हिंदू पंचांग में हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि भगवान कार्तिकेय यानी स्कंद, मुरुगन और सुब्रमण्य को समर्पित मानी जाती है। सितंबर 2026 में स्कंद षष्ठी 16 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु भगवान कार्तिकेय की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं।

सितंबर में 16 सितंबर को रखा जाएगा स्कंद षष्ठी व्रत

स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। भगवान कार्तिकेय को स्कंद, मुरुगन और सुब्रमण्य के नाम से भी जाना जाता है। वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। दक्षिण भारत, खासकर तमिल परंपरा में स्कंद षष्ठी का विशेष धार्मिक महत्व है।

सितंबर 2026 में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर 16 सितंबर, बुधवार को स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जाएगा। अलग-अलग शहरों के पंचांग में तिथि के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना उचित रहता है।

भगवान कार्तिकेय की पूजा का क्या है महत्व?

धार्मिक मान्यता में भगवान कार्तिकेय को साहस, शक्ति, विजय और सुरक्षा से जोड़ा जाता है। स्कंद षष्ठी पर उनकी पूजा करने से भक्त मानसिक शक्ति और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुकाबला करने का आशीर्वाद मांगते हैं। दक्षिण भारत में यह दिन भगवान मुरुगन की उपासना के प्रमुख अवसरों में शामिल है।

पौराणिक परंपरा में स्कंद षष्ठी को भगवान कार्तिकेय की असुरों पर विजय से भी जोड़ा जाता है। विशेष रूप से कार्तिक महीने की स्कंद षष्ठी पर तमिल परंपरा में सूरसम्हारम का आयोजन प्रमुख रूप से किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

कैसे रखें व्रत और करें पूजा?

स्कंद षष्ठी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या तस्वीर के सामने पूजा करते हैं। पूजा में भगवान का अभिषेक कर फूल, चंदन, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद दीपक जलाकर भगवान कार्तिकेय की आरती और प्रार्थना की जाती है।

कई भक्त इस दिन उपवास रखते हैं। व्रत के नियम परंपरा और व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही उपवास करना चाहिए।

पूजा के दौरान भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जाप और उनकी कथा का पाठ भी किया जाता है। दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सफलता की प्रार्थना की जाती है।

स्कंद षष्ठी का मूल संदेश श्रद्धा, आत्मसंयम और सकारात्मकता से जुड़ा है। भक्त इस अवसर को भगवान कार्तिकेय के प्रति समर्पण और जीवन में साहस व अनुशासन बढ़ाने के दिन के रूप में मनाते हैं।

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