भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल उपग्रह प्रक्षेपण और वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की आर्थिक तरक्की और रणनीतिक मजबूती का नया इंजन बनकर उभर रहा है।
नई दिल्ली: भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल रॉकेट लॉन्च करने और वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल करने तक सीमित नहीं रह गया है। सैटेलाइट आधारित सेवाओं, पृथ्वी अवलोकन, संचार और नेविगेशन तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को देश की आर्थिक और रणनीतिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बना दिया है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में निवेश, निजी भागीदारी और तकनीकी नवाचार तेजी से बढ़ सकते हैं।
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) और EY की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2033 तक मौजूदा करीब 0.81 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 4.22 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यानी अगले कुछ वर्षों में इसमें कई गुना विस्तार की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट में इस वृद्धि के पीछे सरकारी नीतियों में बदलाव, निजी निवेश, तेजी से विकसित हो रहा स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम और किफायती अंतरिक्ष सेवाओं की बढ़ती मांग को प्रमुख कारक बताया गया है।
200 से ज्यादा उपयोग के मामलों की पहचान
रिपोर्ट में अंतरिक्ष तकनीक के 200 से अधिक उपयोग के मामलों (Use Cases) की पहचान की गई है। इनमें पृथ्वी अवलोकन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और पोजिशनिंग, नेविगेशन एवं टाइमिंग यानी PNT जैसी प्रमुख तकनीकें शामिल हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल अब सीधे आम लोगों और कारोबार से जुड़े क्षेत्रों में भी बढ़ रहा है।
उदाहरण के तौर पर सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल खेती में फसल की निगरानी, मौसम के अनुमान और सिंचाई की बेहतर योजना के लिए किया जा सकता है। इसी तरह लॉजिस्टिक्स कंपनियां नेविगेशन और लोकेशन आधारित तकनीकों की मदद से परिवहन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
कृषि से लेकर आपदा प्रबंधन तक असर

भारत में अंतरिक्ष तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का प्रभाव कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ने की उम्मीद है। कृषि, लॉजिस्टिक्स, बुनियादी ढांचा, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, वित्तीय सेवाएं, मत्स्य पालन और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित तकनीक नई संभावनाएं पैदा कर रही है। आपदा प्रबंधन में सैटेलाइट इमेजरी बाढ़, चक्रवात, जंगल की आग और भूस्खलन जैसे घटनाक्रमों की निगरानी में मदद कर सकती है।
वहीं शहरी क्षेत्रों में पृथ्वी अवलोकन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ते शहरों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे की योजना बनाने में किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और उनसे निपटने की रणनीति तैयार करने में भी अंतरिक्ष आधारित डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
रक्षा और रणनीतिक क्षेत्र में भी बढ़ेगी भूमिका
भारत के लिए अंतरिक्ष तकनीक का महत्व आर्थिक उपयोग से आगे बढ़कर रणनीतिक क्षेत्र तक पहुंचता है। संचार, नेविगेशन, निगरानी और पृथ्वी अवलोकन जैसी क्षमताएं राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। देश में स्वदेशी अंतरिक्ष क्षमताओं के विस्तार से रणनीतिक जरूरतों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल सकती है। इसी वजह से अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी संस्थानों के साथ-साथ निजी कंपनियों और स्टार्टअप की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है।
रिपोर्ट में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की अगली वृद्धि के लिए केवल नई सेवाओं को विकसित करना ही पर्याप्त नहीं माना गया है। अंतरिक्ष से जुड़ी हार्डवेयर और विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना भी जरूरी बताया गया है। इसमें स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रणोदक प्रणाली, सेंसर और परीक्षण सुविधाओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना शामिल है। इससे भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के साथ वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।











