राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में जातिगत भेदभाव को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर समाज में जातिगत भेदभाव को पूरी तरह से समाप्त करना है, तो इसके लिए सबसे पहले मन से जाति को मिटाना होगा।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भेदभाव को खत्म करने के लिए सबसे पहले मन से जाति को मिटाना आवश्यक है। संघ प्रमुख ने बताया कि सामाजिक व्यवहार में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए मानसिक स्तर पर जाति की अवधारणा को समाप्त करना होगा।
उन्होंने आगे कहा कि पहले जाति केवल पेशे और काम से जुड़ी थी, लेकिन समय के साथ यह समाज में गहरी जड़ें जमा गई, जिससे भेदभाव बढ़ा। भागवत यह बात RSS के शताब्दी वर्ष के मौके पर छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित जन संगोष्ठी में बोलते हुए कह रहे थे।
जातिगत भेदभाव समाप्त करने की दिशा
भागवत ने बताया कि पहले जाति केवल पेशे और कार्य के आधार पर होती थी, लेकिन समय के साथ यह सामाजिक जीवन में इतनी गहरी जड़ें जमा गई कि भेदभाव बढ़ गया। उन्होंने कहा कि अगर जाति को मन से मिटाने का प्रयास ईमानदारी से किया जाए, तो अगले 10-12 वर्षों में देश में जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल भेदभाव को खत्म करना ही नहीं, बल्कि समाज को समान अवसर और न्याय की दिशा में ले जाना है। मोहन भागवत ने कहा, संघ व्यक्तिगत चरित्र निर्माण और समाज सुधार के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के लिए काम करता है। यह किसी प्रतिक्रिया या प्रतिस्पर्धा से प्रेरित संगठन नहीं है।

संघ का दृष्टिकोण: जाति नहीं, चरित्र और राष्ट्र निर्माण
RSS प्रमुख ने स्पष्ट किया कि संघ का लक्ष्य समाज में समानता और एकजुटता को बढ़ावा देना है। उनका कहना है कि जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए हर व्यक्ति को स्वयं अपने विचारों और व्यवहार से जाति आधारित भेदभाव को मिटाने का प्रयास करना होगा। उन्होंने बताया कि व्यक्तिगत स्तर पर चरित्र निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारी निभाना ही राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी तरीका है।
भागवत ने यह भी कहा कि संघ का दृष्टिकोण किसी अन्य राजनीतिक या सामाजिक संगठन की प्रतिक्रिया में नहीं है। उनका संगठन समान विचारधारा और मूल्यों पर आधारित है, जिसका उद्देश्य भारत को उसकी महानता और गौरवपूर्ण स्थिति तक पहुंचाना है।
धर्म और सृष्टि का संबंध
संघ प्रमुख ने अपने बयान में धर्म की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि धर्म ही पूरी सृष्टि का संचालक है। भागवत के अनुसार, जब सृष्टि बनी, तब उसे चलाने के लिए नियम बनाए गए, और वही नियम धर्म के रूप में जाने जाते हैं। पूरी दुनिया उन्हीं नियमों के अनुसार चलती है। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी चीज पूरी तरह अधर्मी नहीं हो सकती—चाहे वह मनुष्य हो, प्रकृति हो या समाज।
उन्होंने आगे बताया कि राज्य भले ही सेकुलर हो सकता है, लेकिन मनुष्य, प्रकृति या सृष्टि की कोई भी गतिविधि धर्म के नियमों के बिना नहीं चल सकती। उनका यह बयान समाज और नैतिक मूल्यों के महत्व पर भी प्रकाश डालता है। मोहन भागवत के बयान को सामाजिक न्याय और समानता के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। उनके अनुसार जाति आधारित भेदभाव केवल सामाजिक संरचना में बाधा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास और एकता के मार्ग में भी रोड़ा है।











