सोनभद्र में आदिवासी महिलाओं ने मिलेट्स बिजनेस से बदली तस्वीर, नक्सल प्रभावित क्षेत्र बना उद्यमिता का मॉडल

सोनभद्र की आदिवासी महिलाएं मिलेट्स उत्पाद बनाकर सफल उद्यमी बनीं। सरकारी योजनाओं से रोजगार, आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिली।

सोनभद्र में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और सरकारी योजनाओं के तहत आदिवासी महिलाएं मिलेट्स आधारित उत्पाद बनाकर सफल कारोबार कर रही हैं। इससे रोजगार, आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिली है।

लखनऊ: सोनभद्र, जिसे कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, अब ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की नई पहचान बना रहा है। मिलेट्स बिजनेस से जुड़ी स्वयं सहायता समूहों की आदिवासी महिलाएं सरकारी सहयोग, प्रशिक्षण और बेहतर बाजार उपलब्ध होने के बाद सफल उद्यमी बनकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं।

सरकारी योजनाओं से बदली सोनभद्र की तस्वीर

चार राज्यों की सीमाओं से सटे सोनभद्र जिले को लंबे समय तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में देखा जाता था। सीमित रोजगार, कमजोर आधारभूत सुविधाएं और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां यहां के विकास में बड़ी बाधा थीं। हालांकि, हाल के वर्षों में सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा और सरकारी योजनाओं की बेहतर पहुंच ने जिले की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रशासन का कहना है कि विकास कार्यों और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन से ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर तैयार हुए हैं।

मिलेट्स उत्पादों ने बढ़ाई महिलाओं की आय

सरकार की श्रीअन्न (मिलेट्स) प्रोत्साहन नीति के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, आधुनिक पैकेजिंग और मार्केटिंग की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। इसके बाद महिलाओं ने रागी मिलेट लड्डू, अलसी के लड्डू, मिलेट कुकीज, बिस्किट, नमकीन, महुआ के लड्डू और सांवा चावल जैसे पारंपरिक एवं पौष्टिक उत्पाद तैयार करने शुरू किए। इन उत्पादों की मांग स्थानीय बाजारों के साथ-साथ दूसरे राज्यों तक पहुंचने लगी है, जिससे महिलाओं की आमदनी में लगातार वृद्धि हुई है।

स्वयं सहायता समूह बने सफलता की मिसाल

घोरावल विकासखंड में संचालित 'दुर्गा स्वयं सहायता समूह' से जुड़ी 15 से अधिक महिलाएं मिलेट्स उत्पादों की बिक्री के माध्यम से हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। इससे समूह की प्रत्येक सदस्य को सालाना लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त आय मिल रही है।

वहीं, म्योरपुर विकासखंड के लिलासी गांव में 'खुशबू आजीविका स्वयं सहायता समूह' की महिलाएं महुआ के लड्डू और सांवा चावल जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार कर बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। इनके उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और कई स्थानों से ऑर्डर भी प्राप्त हो रहे हैं।

महिला सशक्तिकरण को मिली नई दिशा

मुख्य विकास अधिकारी जागृति अवस्थी के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का उद्देश्य महिलाओं को केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण, कौशल विकास और स्वरोजगार के माध्यम से सफल उद्यमी बनाना है। मिशन के तहत ग्रामीण महिलाओं को उत्पादन से लेकर ब्रांडिंग और विपणन तक हर स्तर पर सहयोग दिया जा रहा है।

प्रशासन का मानना है कि इसी समन्वित प्रयास का परिणाम है कि सोनभद्र जैसे क्षेत्र, जहां कभी असुरक्षा और नक्सल गतिविधियों की चर्चा होती थी, आज महिला उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास के सफल मॉडल के रूप में अपनी नई पहचान बना रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ-साथ जनजातीय परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

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