मिलेजुले वैश्विक संकेतों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव के बीच शुक्रवार को घरेलू शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, इस कमजोर माहौल में भी टाटा ग्रुप के शेयरों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया।
बिजनेस न्यूज़: भारतीय शेयर बाजार में गिरावट के बीच टाटा ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिली। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव के बावजूद टाटा समूह के कुछ शेयरों ने निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया। इस तेजी की मुख्य वजह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी Tata Sons को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) श्रेणी में बनाए रखने का फैसला रहा। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह Tata Sons द्वारा अपने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के अनुरोध की समीक्षा कर रहा है।
RBI के इस फैसले के बाद बाजार में यह उम्मीद बढ़ी कि Tata Sons की भविष्य की रणनीति को लेकर तस्वीर जल्द साफ हो सकती है। इसी सकारात्मक भावना का असर टाटा समूह से जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर देखने को मिला।
Tata Investment और Tata Chemicals के शेयरों में उछाल
शुक्रवार के कारोबार में Tata Investment Corporation और Tata Chemicals के शेयरों में तेजी दर्ज की गई। Tata Chemicals का शेयर पिछले सत्र में 663.25 रुपये पर बंद हुआ था, जबकि कारोबार की शुरुआत 679.55 रुपये पर हुई। दिन के दौरान यह बढ़कर 701.75 रुपये तक पहुंच गया। वहीं Tata Investment Corporation का शेयर पिछले बंद भाव 667.05 रुपये के मुकाबले लगभग 666.90 रुपये पर खुला और कारोबार के दौरान 713 रुपये तक पहुंच गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशकों ने RBI के फैसले को Tata Group की होल्डिंग संरचना और भविष्य की संभावित योजनाओं के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा।
Tata Sons पर RBI के नियम क्यों लागू हुए?

RBI के अनुसार, Tata Sons की कुल संपत्ति 31 मार्च 2026 तक लगभग 2.01 लाख करोड़ रुपये थी। इतनी बड़ी संपत्ति के कारण कंपनी को अपर-लेयर NBFC श्रेणी में शामिल किया गया। अपर-लेयर NBFC कंपनियों पर सामान्य NBFC की तुलना में अधिक सख्त नियामकीय नियम लागू होते हैं। इनमें पूंजी पर्याप्तता, जोखिम प्रबंधन और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े अतिरिक्त प्रावधान शामिल होते हैं।
RBI ने यह भी बताया कि किसी कंपनी को एक बार अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत किए जाने के बाद वह कम से कम पांच वर्षों तक इस श्रेणी के नियमों के तहत बनी रहती है। भले ही बाद की समीक्षा में कंपनी कुछ मानदंडों को पूरा न करे, फिर भी उस पर लागू नियामकीय निगरानी जारी रह सकती है।
CIC रजिस्ट्रेशन छोड़ने की Tata Sons की योजना
Tata Sons ने RBI से अपने Core Investment Company (CIC) रजिस्ट्रेशन को वापस लेने का अनुरोध किया है। हालांकि, इसके लिए कंपनी को कुछ निर्धारित शर्तें पूरी करनी होंगी। RBI के नियमों के अनुसार, डी-रजिस्ट्रेशन के लिए ऐसी कंपनियां पात्र हो सकती हैं जिनके पास सार्वजनिक धन का उपयोग नहीं हो रहा हो, ग्राहकों से सीधा लेनदेन नहीं हो और जिनकी कुल संपत्ति एक तय सीमा से कम हो।
Tata Sons की बड़ी संपत्ति के कारण इस प्रक्रिया को लेकर बाजार में कई सवाल बने हुए हैं। Tata Sons की संभावित लिस्टिंग लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। RBI के अपर-लेयर NBFC नियमों के अनुसार कुछ कंपनियों के लिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना आवश्यक हो सकता है। Tata Trusts की Tata Sons में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। कंपनी की भविष्य की संरचना को लेकर Tata Group के भीतर भी अलग-अलग विचार सामने आए हैं।
कुछ ट्रस्टी Tata Sons की लिस्टिंग के पक्ष में रहे हैं, जबकि कुछ लोग कंपनी को निजी इकाई बनाए रखने के समर्थन में हैं। Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा भी Tata Sons को अनलिस्टेड रखने के पक्ष में बताए जाते हैं।












